Published September 15, 2017 | Version v1
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र ंगा े क े माध्यम स े या ेग साधना का महत्व

Authors/Creators

  • 1. Laxmibai national institute of physical education Gwalior (M.P.)

Description

रंगा ें में नया रूप, नया भाव, स्थापित करने की जो अनुठी लाक्षाणिकता एवं अनुभवों क े मिश्रण से प ्राप्त इस प्रक्रिया को
उपया ेग में लाया गया ह ै ं। यह ज्ञार्नाजन का प्रथम पक्ष जो मनुष्य क े जीवन में जन्मजात हा ेता ह ैं। अर्था त भावनाआ ें क े माध्यम
से कार्य करने की रीति जिसका विकास, अभ्यास और अनुभव से होता ह ैं। भावो का े इस प ्रकार से उधघाटित किया जाता ह ैं।
जा े पथ प ्रदर्ष क की पहचान बन जाती ह ैं। भावों का े अ ंतराल में अ ंकित कर समाया ेजित करने का विनम्र भाव भावात्मक शैली
गतिषील होती ह ैं। जो रंगा ें का स्थायित्व स्थापित करने की विकास गति का अनूठा प्रया ेग ह ैं।
रंगा ें की प ्रधानता
हम सभी रंगा े का े जीवन के आभामण्डल में समायोजन करने के माध्यम से उसमें व्यापक रूप का े प ्रभावित करते हैं। हमारे
सुख-दुख उत्तेजना, भय, विराम, उल्लास आदि सभी भावनाओं क े उद्धिपन में रंगा ंे का प ्रभाव देखा जा सकता हैं। रंगा े की
भाषा में रंगभावना एव ं विचारांे क े संक्षिप्त रूप होते है ं। रंगा ंे द्वारा उनका प्रया ेग करने की विधि व्यक्तिगत अनुभव आ ैर रूचि से
प ्रभावित होती ह ै। जीवन मंे अर्थ सार को व्यक्त करने में रंग क े समय्र्थ का उपयोग अपनी अनुभुती क े माध्यम से किया जाता
ह ैं। 1 .....श्वेत प ्रकाष सभी रंगा े का योग ह ै ं। सूर्य क े वर्णषट के रंगा ें का े प ुनः एक कर देने से श्व ेत प ्रकाष बन जाता है। सभी
रंग श्व ेत प ्रकाश का अंग हा ेने के कारण श्व ेत की तुलना में कम शक्तिशाली हा ेते है। 2 रंग प ्रदार्थ  की सभी रंगतों का े मिलान े
से एक अद्भुत छटा दिगदर्शि त होती ह ै प ्रकृति में रंगा ें की जो तीव ्रता होती ह ै। उसे भावा ें क े माध्यम से अवतरित किया जाता
ह ै। अन्य प ्रयुक्त तरल पदार्थ क े कारण ही रंगा ें की चमक में अंतर आ जाता ह ै। अ ंतर भावों की भाव ुकता से रंग पदार्थ सतः
से प ्रकाश को परिवर्तित करते है। उनमें उपस्थित वायु के कणों क े कारण वे ध ुधले दिखाई देते ह ै। एवं प ्रकाश क े अपर्वतन के
कारण उनका प ्रभाव बदल जाता ह ै। रंगा ें को मिलने में अधिक से अधिक शुद्धता का बना रहना आवश्यक है। स्वच्छ रंगा ें का े
अ ंतर मन म े समहित करने क े लिए रंगा ें मे ं अतिरिक्त भाव एव ं सामजस्य की भावना का ओत प ्रा ेत हा ेना अत्यंत आवश्यक ह ै।
रंगाा ें को चिरकाल से व ैज्ञानिक तरिका े ं से क्रम बद्ध रेखने का प्रायस किया जा रहा ह ै। जिससे रंगा े का सर्वमान एव ं साधारण
कम रेग चक्र क े रूप स्थापित ह ुआ ह ै। इसमें अनेक प्रकार की रंगते पदर्षित हा ेती ह ै। तथा इनमें से जब किसी रंग की
अधिकता हा ेती है ं तो वह उदियभाव दृष्टि गोचर हा ेता ह ै?
 

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