ग्रामीण किशोरों के दुश्चिंता पर सूर्य नमस्कार के प्रभाव का अध्ययन
Authors/Creators
- 1. शोधार्थी, योग विज्ञान विभाग, महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय, पौड़ी-गढव़ ाल, उत्तराखण्ड
- 2. शोध निदेशक, योग विज्ञान विभाग, महाराजा अग्रसेन हिमालयन गढ़वाल विश्वविद्यालय, पौड़ी-गढ़वाल, उत्तराखण्ड
Description
किशोरावस्था में लड़के-लड़कियां के मन और शरीर में निरन्तर परिवर्तन होते हैं। चिन्तन एक मानसिक प्रक्रिया है। कुछ विद्वान चिन्तन को वातावरण से मिलन े वाली सूचनाआें का मानसिक जोड़-तोड़ बताते है। चिन्तन एक अव्यक्त मानसिक प्रक्रिया है जिसमें चिन्तनषील व्यक्ति अपने से जुड़े हुए प्रतीकों, सम्प्रत्ययों, नियमों एवं अन्य मध्यस्थ इकाइयों के मानसिक जोड़-तोड़ में लगा रहता है। मनुष्य के जीवन में सबसे महत्वपण्ूर् अवस्था किशोरावस्था होती है। यह अवस्था लगभग 13 से 19 वर्ष तक होती है। एक बालक जो भी अनुभव इस आयु वर्ग में ग्रहण करता है, वे उसके भावी जीवन के निर्माण में सहायक हैं। यह अवस्था बाल्यकाल से परिपक्वता तक का अस्थिर व अद्भुत माग र् है। यह अवस्था स्वप्न, आगाध प्रेम तथा दिलां को हिला देने वाली अवस्था है। इस आयु वर्ग को जीवन का बसन्त काल भी कहा जाता है।यह शोध ऋषिकेश नगर से लग े हुए ग्रामां के किशोरों पर किया गया है। इसमें 50 किशोरियॉ एवं 50 किशोरां का े सम्मिलित किया गया है। यह शाध्े ा 40 दिनां े का रहा है। शाध्े ा के परिणाम सकारात्मक है। सूर्य नमस्कार के अभ्यास से शरीर बलिष्ठ व ओजस्वी, चेतना प्रखर, नर्वस पण््र ाली बहे तर, शरीर के जोड़ मजबूत, मांसपेषियॉ सुगठित, पाचन क्षमता दुरस्त, हार्मांन संतुलित होने के साथ-साथ मानसिक सबलता, प्रफुल्लता, उत्साह व कुछ करने उमंग जाग्रत होती है।
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