Published February 18, 2018 | Version v1
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मिथकों का पुनर्पाठ प्रस्तुत करती एक किताब (महिषासुर: मिथक व परंपराएं की प्रोफेसर चन्द्रभूषण गुप्त 'अंकुर' द्वारा लिखित समीक्षा)

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मिथकों का पुनर्पाठ प्रस्तुत करती एक किताब

प्रोफेसर चन्द्रभूषण गुप्त ‘अंकुर’

महिषासुर आन्दोलन 21वीं सदी में आदिवासी और दलित-बहुजनों का एक आंदोलन बन कर उभर रहा है। आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों का एक व्यापक हिस्सा, इसके माध्यम से नए सिरे से अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश कर रहा है। यह आन्दोलन क्या है, इसकी जड़ें कहाँ तक विस्तारित हैं, बहुजनों की सांस्कृतिक परम्परा में इसका क्या स्थान है, लोक जीवन में उनकी उपस्थिति किन-किन रूपों में है, इसके पुरातात्विक साक्ष्य क्या हैं? बहुजनों के गीतों, कविताओं एवं नाटकों में महिषासुर किस रूप में याद किए जा रहे हैं और अकादमिक-बौद्धिक वर्ग को इस सांस्कृतिक आन्दोलन ने किस रूप में प्रभावित किया है, उनकी प्रतिक्रियाएं क्या हैं? क्या महिषासुर अनार्यों के पूर्वज थे, जो बाद में एक मिथकीय चरित्र बन कर बहुजन संस्कृति, जीवन पद्धति और सभ्यता के प्रतीक पुरूष बन गए? इन सवालों को ‘महिषासुर : मिथक और परंपराएं’ किताब अपने केंद्र में रखती है। इसके साथ ही विलुप्ति के कगार पर खड़े असुर समुदाय का विस्तृत नृवंशशास्त्रीय अध्ययन भी प्रस्तुत किया है।

भारतीय उपमहाद्वीप में असुर, किरात, नाग, यक्ष, द्रविड़ और आर्य आदि अनेक प्रजातियाँ निवास करती रही हैं। कालान्तर में आर्यों ने पूरे उपमहाद्वीप पर आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व कायम कर लिया। इस कारण आज देश में द्विज और अद्विज या यों कहें कि अभिजन और बहुजन— दो सामाजिक श्रेणियाँ बन गई हैं। द्विज वर्चस्व की स्थापना में पौराणिक मिथकों की अहम भूमिका रही है। ये मिथक कैसे गढ़े गए, रचे गए और इसका उद्देश्य क्या था? यह पूरी प्रक्रिया कैसे घटित हुई, किताब इसका भी जायजा लेती है।

मिथकों के आधार पर भारतीय समाज और इतिहास के भीतरी सूत्रों को तलाश करने प्रक्रिया कोई नई नहीं है। ज्योतिबा फुले, आम्बेडकर, पेरियार समेत अधिकांश बहुजन चिन्तकों ने इस आधार पर असुर-संस्कृति की न सिर्फ विस्तृत गवेषणा की है बल्कि ध्यान से देखा जाए तो उनकी वैचारिकी का प्रस्थान बिन्दु यही रहा है और उनके वांग्मय में यह अच्छा खासा स्थान घेरता है।

पुस्तक से गुजरते हुए, पाठक यह महसूस करेंगे कि आदिवासी परम्पराएं ही रूपान्तरित होकर अन्य पिछड़ी जातियों, दलित जातियों समेत अद्विज समुदाय के एक बड़े हिस्से तक फैली हैं। इनकी मौजूदगी इस बात का भी संकेत है कि इन समुदायों का उद्गम एक रहा है। अब लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इनके राजनीतिक हित भी घनिष्ट रूप से जुड़ गए हैं।

 

प्रमोद रंजन द्वारा संपादित यह पुस्तक, परिशिष्ट समेत छः खंडों में विभाजित है। पहला खंड : यात्रा वृतान्त में भारत के कई राज्यों में विस्तारित महिषासुर से जुड़े पुरातात्विक स्थानों और पूजा स्थानों की खोज पर केन्द्रित है। यह खण्ड महिषासुर से संबंधित पुरातात्विक साक्ष्यों और लोक परंपरा में उनकी उपस्थिति की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। दूसरा खण्ड मिथक एवं परम्पराएं हैं जिसमें ‘गोंडी पुनेम दर्शन और महिषासुर’, ‘हमारा महिषासुर दिवस’, ‘दुर्गा सप्तशती का असुरपाठ’, ‘महिषासुर: एक पुनर्खोज’, ‘कर्नाटक की बौद्ध परम्परा और महिष’, ‘आदिवासी देवी चामुंडा और महिषासुर’, ‘बिहार में असुर परम्पराएं’, ‘छक कर शराब पीते थे देवी-देवता’, ‘डॉ। आंबेडकर और असुर’ शीर्षक लेख हैं।

खंड-3, आन्दोलन की वैचारिकी पर केन्द्रित है, मसलन ‘महिषासुर आन्दोलन की सैद्धान्तिकी- एक संरचनात्मक विश्लेषण’, ‘संस्कृति का अब्राह्मणीकरण— बरास्ता महिषासुर आन्दोलन’, ‘भारतमाता और उसकी बगावती बेटियाँ’, ‘पसमांदा मुसलमान और महिषासुर शहादत दिवस’ शीर्षक रचनाएं आन्दोलन और उसकी वैचारिकी से जुड़े तमाम प्रश्नों पर केन्द्रित हैं।

खंड-4, ‘असुर: संस्कृति व समकाल में असुरों का जीवनोत्सव’, ‘शापित असुर: शोषण का राजनैतिक अर्थशास्त्र‘ और ‘कौन है वेदों के असुर?’ शीर्षक रचनाएं हैं। खंड-5 साहित्य पर केन्द्रित है, इसमें जोतिराव फुले की प्रार्थना, संभाजी भगत का गीत, छज्जूलाल सिलाणा की रागिणी, कंवल भारती की कविताएं, रमणिका गुप्ता की कविताएं, विनोद कुमार की कविता और संजीव चंदन का नाटक: असुरप्रिया शामिल है।

खंड-6 परिशिष्ट में, महिषासुर दिवस से सम्बन्धित तथ्य पुस्तक के लेखकों का परिचय है।  समाज-विज्ञान एवं सांस्कृतिक विमर्श के अध्येताओं, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, साहित्य प्रेमियों और रंगमंच कर्मियों के लिए यह एक आवश्यक पुस्तक है।

(18 फरवरी 2018 को दैनिक समाचार पत्र राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

 

किताब :  महिषासुर : मिथक और परंपराएं

संपादक : प्रमोद रंजन

मूल्य : 350 रूपए (पेपर बैक), 850 रुपए (हार्डबाऊंड)

पुस्तक सीरिज : फारवर्ड प्रेस बुक्स, नई दिल्ली

प्रकाशक व डिस्ट्रीब्यूटर : द मार्जिनलाइज्ड, वर्धा/दिल्ली, मो : +919968527911 (वीपीपी की सुविधा उपलब्ध)

ऑनलाइन यहां से खरीदें : https://www.amazon.in/dp/B077XZ863F

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अमर उजाला में चंद्रभूषण अंकुर महिषासुर मिथक व परंपराएं.pdf

Additional details

References

  • Ranjan, Pramod, editor. महिषासुर : मिथक और परंपराएं  [Mahishasura: Myths and Traditions]. 2017, https://www.goodreads.com/book/show/53029295.
  • रंजन, प्रमोद, संपादक. महिषासुर मिथक व परंपराएं. 2017.
  • Ranjan, P. (2017). यात्रा वृतांत: महोबा में महिषासुर. Forward Press.
  • Prakash, R., & Ranjan, P. (2015). एक सांस्कृतिक आंदोलन के चार साल. Forward Press, 7(12), 54-62.
  • Ranjan, P. (Ed.). (2017). Mahishasur: A People's Hero. The Marginalised.