Published September 12, 2022 | Version v1
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" मृदुला गर्ग के ' मैं और मैं ' उपन्यास के संदर्भ में "

  • 1. कला महाविद्यालय नांदुरघाट, ता. केज जि. बीड 431126

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सारांश

  प्रेम एक ऐसा तत्व है, जो मनुष्य जीवन में केंद्रीय भूमिका निभाता है । कुछ लोगों  के अनुसार प्रेम एक साधारण शब्द है ,पर जब कोई इसका सही अर्थ जान ले तो यह विशिष्ट हो जाता है । स्त्री- पुरुष के संबंधों  में इस प्यार का विशेष स्थान है । स्त्री- पुरुष का आपसी आकर्षण में  प्यार होता है  । जहाँ पहले प्रेम पर पुरुषों  का एकाधिकार था वहाँ  अब दोनों  का अधिकार माना जाने लगा ।  प्रेमी प्रेमीका का एक दुसरे के प्रति परिपक्व और सच्चा प्यार पुरी तरह आजाद पुरुष तथा पुरी तरह आजार स्त्री के बीच संभव है । आजकल  पत्र पत्रिकाओं  में भी शरीर  सम्बन्धों यौन की चर्चा आम है। आधुनिकता के दौर में पढें लिखें   समझदार  लोग इस बात को बडी बात नही मानते है । विवाहपूर्व प्रेम - संबंधो की चर्चा जब  विवाहोत्तर प्रेम संबंधों  को भी मान्यता दि जाने लगी है ।  जैनेंद्र ने अपने उपन्यासों  में  चित्रित     प्रेमी -  प्रेमिकाओं  की स्थिति  से अवगत कराया है।  उससे मृदुला  गर्ग के उपन्यासों  में   चित्रित प्रेमी प्रेमिकाओं की स्थिति काफी भिन्न है।  “ विचार के स्तर पर मृदुला गर्ग ने  प्रेम को  अशरीरी  माना है  । उसकी परमगति प्रेमी से एकात्मक होने  में  है, एक शरीर होने में नही  ।   आत्मा का तब इतना घनिष्ठ समागम हो जाता है कि  एक - दूसरे की उपस्थिती - अनुपस्थिती महत्त्वहीन  हो उठती है । ” 1 जब समाज के नैतिक  बन्धनों के कारण कोई प्रेमी शरीर संबंध स्थापित नही कर पाता तो वह प्रेम  अशरीरी है। यह  वे स्वीकार नही करती  । क्योंकि वे भोग-   लिप्सा और संभोग में  कोई अंतर नही। मानती वे प्रेम का आदर्श रूप उसे स्वीकार करती है जो प्रेम सामाजिक दबावों  से पुरी तरह मुक्त होकर सहज विकास को प्राप्त करे  ।  ऐसी ही स्थिती उनके उपन्यासों में  पायीं  जाती है

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