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प्राचीन भारतीय आयुर्वेदिक परम्परा का वर्तमान परिदृष्य: सहरिया जनजाति के विषेष संदर्भ में

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प्राचीन भारतीय इतिहास में उपचार की आयुर्वेदिक परम्पराओं से लेकर वर्तमान तक चिकित्सा की अनेक आधुनिक पद्धतियाॅ विद्मान है। चूंकि भारत देष विविधताओं से परिपूर्ण देष है। इसलिए इस देष की अनेक जनजातियों के रहन-सहन, रीति-रिवाज, भाषा पद्धति, एवं चिकित्सीय प्रणाली आदि। गौण्ड, भील, बैगा, मीना, (मध्य भारत) मुण्डा, संथाल, गारो, खासी, (उत्तर-पूर्वी भारत), जारवा , सेंटलीज, शोम्पेन (अंडमान और निकोबार द्वीप समूह) एवं टोडा (दक्षिण भारत) पायी जाने वाली महत्वपूर्ण जनजातिया हैं, जो वर्तमान में भी हमारी प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सीय परम्परा की वाहक है। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण जनजाति जिसका अस्तित्व खतरे में दिखलाई पड़ता है, मध्य प्रदेष के उत्तरी क्षेत्र (ग्वालियर, भिण्ड, षिवपुरी, ष्योपुर, गुना, मुरैना) आदि में पायी जाती है। 
सहरिया जनजाति प्राचीन काल से ही चिकित्सा की आयुर्वेदिक परम्परा को परिलक्षित करती आयी है। वर्तमान परिदृष्य में भारत सरकार की अनेक संस्थाओं के माध्यम से इस जनजाति को मुख्यधारा में लाने के महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं। 

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