डॉ. युवराज सोनटक्के के कविता संग्रह अग्निध्वजा में शोषित वर्ग का चित्रण
Authors/Creators
- 1. सहयोगी प्राध्यापक, हिंदी विभाग, सरदार बाबासाहेब माने महाविद्यालय, रहिमतपूर तह. कोरेगाव जि. सातारा ४१५५११ महाराष्ट्र, भारत
Description
जातिव्यवस्था यह हमारे भारतीय समाज को लगा कलंक माना गया हैं। यह वास्तव चित्र हैं की जातिव्यवस्था के कारण ऊँच-निचता की अपनी-अपनी मान्यता के कारण उससे उत्पन्न दंगल, शोषण यह स्वास्थ्यपूर्ण देश के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। उसके भयावह तथा उग्र रूप के कारण अनेक तत्वज्ञानी जातिव्यवस्था यह भारतीय समाज को लगा कैंसर मानते हैं। कवि डॉ. युवराज सोनटक्के जी का 'अग्निध्वजा' यह कविता संग्रह विषम व्यवस्था से उत्पन्न अनेक समस्याएं, कारण तथा उपाययोजना पर प्रकाश डालता है।
'अग्निध्वजा' कविता संग्रह की कविताएं पारिवारिक, देशप्रेम, प्रकृति चित्रण, प्रेम भाव, दलित जीवन आदि विषयक हैं। लेकिन उनका प्रमुख विषय आंबेडकरवादी चेतना होने के कारण हर कविता का चिंतन वेदना और विद्रोह ही रहा हैं। सैकड़ो वर्षो से भारतीय समाज व्यवस्था वर्ण तथा जाति व्यवस्था पर आधारित रही हैं। समाज श्रेष्ठ-कनिष्ठ इन दो वर्गों में विभाजित होने के कारण मालिक-सेवक के बीच हमेशा संघर्ष हुआ हैं। इस संघर्ष का कोई अंत नहीं हैं। मालिक वर्ग ने तानाशाही से देश, देश की सत्ता और निम्न वर्ग पर अधिकार प्रस्थापित करने का प्रयास किया हैं, तो दीन-दलित-गरीब वर्ग उच्च वर्ग से शोषित-पीड़ित होने के कारण विषम व्यवस्था से मुक्त होने के लिए स्वतंत्रता की मांग करता आया हैं। स्वतंत्र भारत देश में उनकी यह मांग स्वतंत्रता, समता, बंधुता और न्याय इन मूल्यों की दृष्टि से सही और सार्थक हैं।
गूंगी हस्ती, आक्रोश, अकाल दुःख, बेबसी, उबलता क्रोध, क्रांतिघन, अग्निपुरुष बाबासाहेब आंबेडकर, दूषित जीवन, दीक्षा भूमि आदि कविताओं में कवि के युवा अवस्था के जीवन अनुभव हैं। जो अमानवीय होने के कारण सहन शक्ति से बाहर हैं। इसलिए उस विषम व्यवस्था के प्रति नफ़रत तथा विद्रोह और आक्रोश निर्माण करने वाले हैं। युवा अवस्था में समानता के बजाय विषमता, न्याय की जगह अन्याय दिखाई देने से क्रोध उत्पन्न होना स्वाभाविक हैं।
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