Published September 1, 2017 | Version v1
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''राजीव गाँधी जल प ्रबधंन मिषन का ग्रामीण क्षेत्रा ें म ें आर्थिक योगदान''

  • 1. षासकीय महाविद्यालय धरमप ुरी

Description

भारतीय क ृषि मानसून का ज ुआं ह ै और यह ज ुआं भारतीय अर्थ षास्त्र और भारतीय जनता सनातन काल स े
अपन े कंध े पर रखे ह ुए षून्य में ताक रही ह ै। वस्त ु स्थिति यह है कि जल के अभाव मे भारतीय कृषि ही क्या
भारत के उद्योग धंधें, कल-कारखान े, और समूची अर्थव्यवस्था ही ठप हो जाती ह ै। पानी के अभाव मे ं गहराता
विद्युत संकट, स ूख े पड ़े खेत आ ैर ब ंद पड ़े कल-कारखानों न े एक ओर हमार े राष्ट ªीय उत्पाद को प ्रभावित
किया है वहीं द ूसरी तरफ हमारा अंतर्राष्ट ªीय निर्यात भी गड ़बड ़ाया है। फलतः एक आ ेर विद ेषी मुद ्रा की कमी
की आप ूर्ति  और द ूसरी ओर वर्त मान समस्याओं से निपटन े के लिए भारी वित्तीय प ्रब ंधन।
”जल जो न होता तो ये जग जाता जल।”
हमार े यहाॅँ षास्त्रों में जल को “आदि-षक्ति”, अमृत आदि कहा गया है। समस्त संसार जल के बिना अधुरा
है। जल मानव षरीर का ही अंग नही अपित ु जीव-जन्त ु प ेड ़-पा ैधे, आदि सजीव चित्रा ें का एक अंग ह ै
और जल के बिना सभी जीव-जन्त ु प ेड ़ पौधे अर्थात सभी सजीव प्राणी जिसमें मन ुष्य भी षामील हैॅ समाप्त
हो जाय ेंगे ं।
द ेष में अथाह जल भण्डार होत े हुए भी हमें जल संचय की जरूरत क्यों पड ़ रही है? इस विषय पर गंभीर
विचार कर ंे ता े र्कइ  महत्वप ूर्ण  पहलु सामन े आत े है। जल समस्या क े पिछे जल का प्रद ुषण ही नही अपित ु
जल का अनियंत्रित एव ं अन ुचित द ुरूपयोग भी कारण है। वास्तव में जल को अब एक द ुर्ल भ उपयोगी संसाधन
मान लेना ही उचित होगा।

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