वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति में नई शिक्षा नीति की प्रासंगिकता रू आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में
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- 1. असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग चमन लाल महाविद्यालय, लंढौरा, उत्तराखंड
Description
मानवीय समाज के विकसित होने की प्रक्रिया सतत रूप से पाषाण कालीन परिस्थितियों से चली आ रही है। जिसमें शिक्षा
के आयाम एवं उसके मूल्य लगातार सुधार और बदलाव की परिस्थिति में रहते हैं। भारत में शिक्षा के संदर्भ में लगातार
मानवीय आधारों पर बदलाव हुई, क्योंकि हड़प्पा संस्कृति के बाद भारत में वैदिक संस्कृति एवं उत्तर वैदिक संस्कृति ने
हजारों वर्षों तक मानवीय समाज को दिशा व दशा दी। जिसके उपरांत भारतीय राजनीतिक सत्ता में विदेशी संस्कृति का
आगमन हुआ। जिसके आधार पर इस्लामिक और पश्चिम संस्कृति की शिक्षाओं ने भारतीय शिक्षा में अपनी जगह बनाई।
किंतु भारतीय शिक्षा के संदर्भ में यह निश्चित किया जाता है कि मानवीय विकास के लिए किसी भी संस्कृति की गुणवत्ता
को स्वीकार कर लिया जाता है। इसी के आधार पर बीसवीं शताब्दी में जब भारत को आजादी मिली तो संवैधानिक एवं
लोकतंत्र के पश्चिमी सिद्धांत को स्वीकार करते हुए, भारत ने आधुनिकता की नीव रखी एवं शिक्षा में पश्चिमी एवं मानव के
विकास के लिए आवश्यक बदलावों को भारतीय शिक्षा में रेखांकित किया। जिसके परिणाम स्वरूप भारत में विज्ञान, चिकित्सा,
सामाजिक विज्ञान एवं मानव के बुनियादी विकास को सरल व सुनिश्चित करने के लिए बदलावों को स्वीकार किया। वर्तमान
21वी शताब्दी के सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकी दौर में भारत के जनांकिकी लाभांश को आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना में
बदलने के लिए नई शिक्षा नीति 2020 को लागू किया है। अतः वर्तमान परिस्थितियों में लागू की गई शिक्षा नीति भारत में
रोजगार एवं आर्थिक परिस्थितियों की उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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