भारतीय साहित्य के आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना
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प्रस्तावना :
वैदिक काल से ही भारतीय साहित्य में ‘राष्ट्र’ जैसे विशिष्ट शब्द का प्रयोग होता रहा है | जिस प्रकार साहित्य का मानव जीवन से गहरा नाता है ठीक उसी तरह राष्ट्र से समाज का गहन सम्बन्ध है | “देश भक्ति का उद्वेलन कभी समर्पण तो कभी आंदोलन का रूप धारण कर लेता है, जिससे व्यक्ति के स्वत्व से लेकर राष्ट्र तथा देश की स्वतंत्रता और समानता की सुरक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण तक के भाव समाविष्ट होते हैं।"[i] राष्ट्र को आधुनिक संकल्पना में नहीं रखा जा सकता क्योंकि राष्ट्र का सम्बन्ध प्राचीनतम है | हम कह सकते हैं कि राष्ट्र हमारी सांस्कृतिक विरासत है | यह हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है | राष्ट्र का हमारी संस्कृति से घनिष्ठ सम्बन्ध है | साहित्य भी इसी संस्कृति का हिस्सा है और एक-दूसरे के साथ परस्पर गुथे हुए हैं | यह एक कड़ी है जिसमें जनमानस के भीतर राष्ट्रीय चेतना को जगाने एवं सुदृढ़ करने में मदद मिलती है | साहित्य में हमेशा से राष्ट्रीय चेतना अग्रणी भूमिका में रही है | भारत देश में रष्ट्रीय चेतना सदैव विद्यमान रही है इसके बिना कोई भी देश अछूता नहीं रह सकता |
महाले, डॉ. सुभाष, ‘माखनलाल चतुर्वेदी और वि.दा. सावरकर की कविताओं में राष्ट्रीय चेतना’, (1997), चन्द्रलोक
प्रकाशन, कानपुर, पृ.25
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