दैनिक पत्र एवं साहित्यिक पत्रिकाओं में हिन्दी
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विचारों से परिमार्जन, परिवर्तन एवं परिवर्द्धन होता रहता हैं। यह सब भाषा का ही परिणाम हैं। आज से लगभग 197 वर्ष
पूर्व अर्थात् 1802 में, जबकि अंग्रेजी शासन का सितारा बुलंदी पर था, तत्कालीन गर्वनर जनरल लाॅर्ड वेलेजली ने यह कहा
था कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी अथवा हिन्दुस्तानी होनी चाहिए। सन् 1803 में गवर्नर जनरल ने एक कानून बनाकर यह
आवष्यक कर दिया था कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में लागू होने वाले कानूनों के हिन्दी अनुवाद सरकारी तौर पर उपलब्ध किए
जाएँ। 1852 से आगरा प्राॅंत का सरकारी गजट हिंदी में प्रकाषित होने लगा था। इसके अतिरिक्त 3 जुलाई, 1805 को
लाॅर्ड लेक ने मथुरा और ब्रज क्षेत्र में गोवध निषेध का ऐतिहासिक फरमान हिंदी में जारी किया था। नाना साहेब फड़नवीस
को पकड़वाने अथवा सूचना देने के लिए एक लाख रूपये के पुरस्कार की घोषणा सबंधी विज्ञप्ति भी हिन्दी में प्रकाषित की
गई थी। हिंदी के साथ सबसे बड़ा विष्वासघात उसके मध्यमवर्ग ने किया, जिसे न तो मातृभाषा के प्रति कोई लगाव हैं, न
अपनी जातीय स्मृतियों को ..... सहेजने की जरूरत। यही मध्य वर्ग मीडिया का पोषक और लक्ष्य हैं। दूसरी ओर कुछ
अपवादों को छोड़ दे ंतो हिंदी मीडिया का बौद्धिक विमर्ष कुछ दषकों से निचले स्तर का रहा हैं। हिंदी में सोच विचार की
जो अप्रतिष्ठा हैं, उसके लिए बहुत हद तक मीडिया भी जिम्मेदार हैं। सफल होने के चक्कर में वह सार्थकता से हट रहा हैं
यदि हम इस समय सचेत नहीं हुए तो भविष्य की भाषा की कल्पना करके ही डर लगता हैं।
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