Published June 30, 2022 | Version Apr-May-June 2022
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भारतीय लोक जीवन में पर्यावरणीय आचार–शिक्षा

  • 1. प्रोफेसर शिक्षाशास्त्र, शिक्षा संकाय मदरहुड विश्वविद्यालय, रुड़की, जनपद-हरिद्वार (उत्तराखण्ड) भारत

Description

भारतीय संस्कृति में अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्रकृति एवं पर्यावरण की महत्ता को स्वीकार करते हुए तथा उसे सर्वोपरि मानते हुए उसके द्वारा सृजित 'पर्यावरण' के पोषक स्वरूप की उपासना की गई है। यजुर्वेद में अन्तरिक्ष, पृथ्वी, वनस्पतियों, औषधियों तथा समस्त ब्रहमाण्ड में शान्ति की प्रार्थना की गई है। यही नहीं, स्वयं शान्ति के लिए शान्ति की प्रार्थना की गई है। धरती को 'माता' तथा नदियों को 'देवता' एवं आकाश को 'पिता' स्वरूप मानकर उसकी उपासना की गई है। ऋग्वेद में 'विपाश' और 'शुतुदि' नदियों को दो गौओं के रूप में स्वीकार किया गया है जो किनारों रूपी बछडों का पोषण करती हुई अपने घर की ओर अग्रसर होती हैं। साथ ही, यह स्वीकार किया गया है कि “गायें बहुत दूध देने वाली हों, पृथ्वी विविध सम्पदाओं से परिपूर्ण हों। बादल समय पर वर्षा करें और सभी लोगों को आनन्दित करने वाली हवाएँ बहें। इसके अलावा ऋषियों ने वृक्ष रक्षा को धर्म के साथ जोड़कर वृक्षारोपण के लिए प्रोत्साहन प्रदान किया। उनके द्वारा निर्देशित जीवन पद्धति इस प्रकार की थी कि व्यक्ति जीव- जन्तुओं, वृक्षों, पशुओं, वनस्पतियों, लताओं को हानि पहुँचाये बिना प्रकृति पर निर्भर रह सके। यज्ञ के लिए समिधाएँ तथा भोजन बनाने के लिए लकड़ियाँ प्राप्त करने हेतु विधान बनाया कि वृक्ष पर स्वतः सूखी लकड़ियों का ही उपयोग उपर्युक्त कार्यों के लिए किया जाए। यज्ञ आहति से औषधियाँ सूक्ष्म (अण) रूप ग्रहण करके समस्त स्थावर जंगम जीवों को पोषण प्रदान करती है, उससे वायुमण्डल स्वच्छ एवं सुगन्धित होता है-ऐसा उनका मानना था। यज्ञ करना प्रत्येक गृहस्थ के लिए एक दैनिक एवं नैतिक दायित्व बन गया। यज्ञ वृष्टि को नियंत्रित करते हैं और वृष्टि समस्त वनस्पतियों तथा जीव -जन्तुओं को पोषण एवं नवजीवन प्रदान करती हैं, ऐसा ऋषि-मुनि मानते आए हैं। हमारी सदैव से यही कामना रही है कि प्रकृति एवं पर्यावरण हमारे अनुकूल रहें। यहाँ यह भी तथ्य स्मरणीय है कि पर्यावरण के प्रति जिस समुदाय का ऐसा लगाव हो, जो पृथ्वी को माता और आकश को पिता के रूप में देखता हो, जो अनल एवं अनिल में अपने अराध्य देवताओं के कल्याणकारी स्वरूप को ढूँढ़ता हो, जिसने जल के स्रोतों को पयस्विनी के रूप में देखा हो, वह पर्यावरण को लूट नहीं सकता। वह पर्यावरण को 'गौ' के रूप में दुह सकता है लेकिन उसकी हत्या नही कर सकता। परन्तु, दुर्भाग्य का विषय है कि पर्यावरण के पोषक स्वरूप को आज हम भूल गये है। प्रकृति और पर्यावरण के परिरक्षण की हमारी मनोवृत्ति में कमी हुई है। आज हम प्रकृति के उपासक नहीं, उसकी सम्पदाओं के उपभोक्ता तथा दोहनकर्ता बन गये हैं। हमारे सभी किया कलाप अर्थ-तंत्र के चारों ओर घूमते हैं। अब हमारे स्वार्थ एवं लोम की कोई सीमा नहीं रह गई है। हमने प्रकृति रूपी 'गौ' का दोहन इस सीमा तक कर लिया हैकि उसके स्तनों से अब 'दूध के स्थान पर 'रक्त की धार' निःसृत होने लगी है। इसी सन्दर्भ में हमारे राष्ट्रपिता गाँधी जी ने बहुत पहले ही चेताया था कि - "हमारी प्रकृति में प्रत्येक जीवों की जरूरत को पूरी करने की क्षमता है लेकिन किसी एक के भी लालच को यह पूरी नहीं कर सकती।

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