Published October 29, 2026 | Version v1

भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन हेतु राजधर्म का दायित्व: 'प्रजासुखे सुखं राज्ञः'

  • 1. पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग देश भगत विश्वविद्यालय, पंजाब
  • 2. सहायक आचार्य, पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग देश भगत विश्वविद्यालय, पंजाब

Description

भारतीय ज्ञान परम्परा में धर्म, संस्कृति, लोककल्याण और शासन को परस्पर संबद्ध माना गया है। इस परम्परा में राजधर्म का मूल उद्देश्य केवल राज्य-व्यवस्था का संचालन करना नहीं, बल्कि प्रजा की सुरक्षा, न्याय, सुख, समृद्धि तथा सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की निरंतरता सुनिश्चित करना माना गया है। “प्रजासुखे सुखं राज्ञः” इसी लोककल्याणकारी दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करने वाला महत्त्वपूर्ण सूत्र है, जिसमें शासक के हित को प्रजा के हित से जोड़ा गया है। प्रस्तुत अध्ययन में भारतीय ज्ञान परम्परा के संदर्भ में राजधर्म की अवधारणा तथा धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में राज्य के दायित्व का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में धर्म को व्यापक अर्थ में कर्तव्य, न्याय, सदाचार, उत्तरदायित्व और सामाजिक मूल्यों से तथा संस्कृति को भाषा, साहित्य, कला, परम्पराओं, लोकज्ञान और सामूहिक स्मृति से संबंधित माना गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान, शिक्षा, साहित्य, कला, पांडुलिपियों और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण लोककल्याण का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समकालीन संदर्भ में राजधर्म को न्याय, जनहित, सांस्कृतिक विविधता, ज्ञान-संरक्षण और सामाजिक समरसता के आधार पर समझने की आवश्यकता है। राज्य, पुस्तकालय, संग्रहालय, शैक्षणिक संस्थान और स्थानीय समुदाय सामूहिक प्रयासों द्वारा भारतीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

Files

भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन हेतु राजधर्म का दायित्व.pdf