प्रौद्योगिकी और मानवीय मूल्य: हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में एक विमर्श
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- 1. सहायक प्राध्यापिका, जैन (मानद विश्वविद्यालय), एस.ओ.एस, जे सी रोड, बेंगगलूरु।
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सारांश
ब्राह्मी-स्वरूपा, जन्मदात्री, ज्ञान-गौरव-शालिनी, प्रत्यक्ष लक्ष्मीरूपिणी, धन-धान्य-पूर्णा,पालिनी ।
दुद्धर्ष रुद्राणी स्वरूपा शत्रु -सृष्टि-लयङ्करी, वह भूमि भारतवर्ष की है भूरि भावों से भरी ॥
मैथिलीशरण गुप्त,भारत-भारती ।
ऐसे महान भारत की संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति मानी गई है। भारत भूमि की सांस्कृतिक समृद्धि तथा शाश्वस मूल्यों विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। आधुनिक युग प्रौद्योगिकी का युग है। विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ प्रदान की हैं, किंतु इसके साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण की समस्या भी उत्पन्नकी हैं। यंत्रीकरण, औद्योगिकीकरण और डिजिटल संस्कृति ने मनुष्य के जीवन-ढाँचे, संबंधों और संवेदनाओं को गहराई से प्रभावित किया है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य हिंदी साहित्य के माध्यम से यह विश्लेषण करना है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी ने मानवीय सरोकारों को किस प्रकार प्रभावित किया है तथा साहित्य ने इन परिवर्तनों के प्रति कैसी मूल्यपरक दृष्टि अपनाई है। प्रेमचंद से लेकर समकालीन रचनाकारों तक, हिंदी साहित्य तकनीकी प्रगति और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर निरंतर बल दिया है।
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