दलित स्त्री आत्मकथाएँ : अनुभव, स्मृति और सामाजिक संघर्ष — एक दृष्टि
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दलित स्त्री आत्मकथाएँ भारतीय साहित्य में प्रतिरोध, अस्मिता और सामाजिक संघर्ष की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में उभरी हैं। ये रचनाएँ केवल व्यक्तिगत जीवन की कथा नहीं हैं, बल्कि जाति, पितृसत्ता और सामाजिक वर्चस्व के बहुस्तरीय तंत्रों के विरुद्ध एक सशक्त हस्तक्षेप प्रस्तुत करती हैं। दलित स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से दलित समुदाय की स्मृतियाँ, अनुभव और संघर्ष साहित्यिक रूप में दर्ज होते हैं, जो मुख्यधारा के इतिहास और साहित्य में लंबे समय तक अनुपस्थित रहे हैं।
यह शोध-आलेख दलित स्त्री आत्मकथाओं का अध्ययन अंबेडकरवादी दृष्टिकोण, स्त्रीवादी विमर्श, उपनिवेशोत्तर सिद्धांत तथा ग्राम्शी और फूको के सत्ता-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में करता है। Urmila Pawar, Kaushalya Baisantri, Sushila Takbhaure, Bama, Baby Halder तथा Shantabai Kamble जैसी लेखिकाओं की आत्मकथाओं के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि दलित स्त्री का अनुभव केवल जातिगत शोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वर्गीय, लैंगिक और सांस्कृतिक उत्पीड़न से भी जुड़ा हुआ है।
इन आत्मकथाओं में स्मृति एक महत्वपूर्ण राजनीतिक औजार के रूप में सामने आती है, जिसके माध्यम से इतिहास के मौन को तोड़ा जाता है और दलित स्त्री की अस्मिता को पुनर्स्थापित किया जाता है। व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक अनुभव में रूपांतरित होकर सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेज बन जाते हैं। इस प्रकार स्मृतियाँ केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं करतीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना भी निर्मित करती हैं।
दलित स्त्री आत्मकथाएँ यह भी उद्घाटित करती हैं कि जाति और लिंग आधारित भेदभाव की संरचनाएँ किस प्रकार व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती हैं। शिक्षा, आत्मसम्मान, सामाजिक स्वीकृति और पहचान की खोज इन रचनाओं के प्रमुख विषय हैं। इन लेखिकाओं ने अपने जीवनानुभवों के माध्यम से उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी है, जिसने उन्हें लंबे समय तक हाशिए पर रखा।
यह लेख यह भी दर्शाता है कि दलित स्त्री आत्मकथाएँ केवल साहित्यिक विधा नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, वैचारिक प्रतिरोध और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए संघर्षरत चेतना के महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। वे भारतीय समाज में समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं तथा समकालीन सामाजिक विमर्श को समृद्ध बनाती हैं।
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पी. शरण्या & प्रो. एस. पद्मप्रिया.pdf
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