दर्शन, नैतिकता और समकालीन सामाजिक चुनौतियाँ : भारतीय संदर्भ में
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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज मनुष्य-निर्मित ऐसी व्यवस्था है, जिसमें मनुष्यता को बनाए रखना अनिवार्य शर्त है। जिस व्यक्ति या समाज में इस शर्त की पूर्ति नहीं हो पाती, वह व्यक्ति या समाज असामाजिक माना जाता है। प्रत्येक समाज अपने देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप मानव जाति के लिए महान मूल्यों की स्थापना तथा उनके आचरण में करणीय और अकरणीय का बोध कराने हेतु कुछ नैतिक अवधारणाएँ निर्मित करता है।
ये नैतिक अवधारणाएँ उस समाज या जाति की समुन्नत बौद्धिक एवं सैद्धांतिक धरोहरों पर आधारित होती हैं, जिन्हें दर्शन या शास्त्र कहा जा सकता है। अतः नैतिकता जीवन-निर्वाह का एक महत्वपूर्ण अवयव है। यदि भारतीय संदर्भ में देखा जाए, तो यह निर्विवाद है कि समस्त भारतीय दर्शन, उसकी दार्शनिक परंपराएँ तथा उनसे प्रस्फुटित नैतिकता का आधार वेद और वैदिक धर्म हैं।
भारतीय चिंतन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों को मानव जीवन का आधार माना गया है। परंपरागत भारतीय जीवन की प्रत्येक गतिविधि में धर्म का विचार सर्वप्रथम किया जाता रहा है। इसी कारण यहाँ युद्ध भी धार्मिक एवं नैतिक मर्यादाओं से बंधा हुआ माना गया है तथा शक्तिशाली व्यक्ति के लिए क्षमा, दया और परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है—
“परहित सरिस धरम नहीं भाई,
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।”
‘मोक्ष’ मनुष्य जीवन की चरम उपलब्धि मानी गई है। ऐसे में भारतीय संस्कृति में अनैतिक आचरण के लिए बहुत कम स्थान बचता है, क्योंकि यहाँ अनैतिकता को पाप के रूप में देखा जाता रहा है।
भारतीय जीवन आदर्श और नैतिकता का एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसे हमारे पौराणिक आख्यानों तथा रामायण और महाभारत के पात्रों— Ram, Sita, Lakshman, Krishna, पांडवों, कुंती तथा कर्ण आदि—के माध्यम से भली-भाँति समझा जा सकता है।
यदि कोई व्यक्ति पौराणिक उदाहरणों से सहमत न हो, तो वह Godaan के होरी के ‘मर्यादा-निर्वाह’, Usne Kaha Tha के लहना सिंह के ‘वचन-पालन’ अथवा Haar Ki Jeet के डाकू खड़गसिंह के ‘हृदय-परिवर्तन’ जैसे साहित्यिक उदाहरणों में भी भारतीय नैतिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति देख सकता है।
समकालीन भारतीय समाज में बढ़ती उपभोक्तावृत्ति, भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक असमानता, पर्यावरणीय संकट तथा डिजिटल युग की नई चुनौतियों के बीच दर्शन और नैतिकता की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। भारतीय दार्शनिक परंपरा आज भी मानवता, सह-अस्तित्व, कर्तव्यबोध, सत्य, अहिंसा और लोकमंगल के मूल्यों के माध्यम से सामाजिक चुनौतियों के समाधान की दिशा प्रदान करती है।
बीज शब्द: व्यवस्था, आदर्श, मूल्य, नैतिकता, अवधारणा, सैद्धांतिकता, अवयव, धर्म, मोक्ष, विचार, वैदिक परंपरा, दर्शन, सामाजिक न्याय, मानवता, लोकमंगल।
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