लोक साहित्य में उत्तराखंड की लोक संस्कृति
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लोक शब्द अत्यंत व्यापक एवं विस्तृत अर्थ लिए हुए है, जिसके अंतर्गत अनेक समाज समाहित होते हैं। साहित्य को हम समाज का दर्पण कहते हैं। इसी रूप में यदि हम लोक साहित्य को देखें, तो उसे समाज, संस्कृति और लोकमानस का आईना कहा जा सकता है। इसके माध्यम से हम किसी भी धरती, क्षेत्र, समुदाय या लोक के मन की गहराइयों तक पहुँचकर उसके संस्कारों की सुंदर एवं सजीव सुगंध का अनुभव कर सकते हैं, माटी की महक महसूस कर सकते हैं तथा उसकी सांस्कृतिक चेतना को समझ सकते हैं।
उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं तथा समृद्ध लोक साहित्य के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की लोक संस्कृति सदियों से लोकगीतों, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकनृत्यों, लोकनाट्यों, कहावतों और लोकविश्वासों के माध्यम से संरक्षित होती रही है।
उत्तराखंड का लोक साहित्य यहाँ के जनजीवन, सामाजिक संबंधों, धार्मिक मान्यताओं, पर्व-त्योहारों तथा प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव का सजीव दस्तावेज़ है। इसमें लोकजीवन की सहजता, संवेदनशीलता, संघर्ष, आस्था तथा सांस्कृतिक मूल्यों का सुंदर चित्रण मिलता है।
लोक संस्कृति किसी भी समाज की आत्मा और पहचान का प्रमुख आधार होती है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में पर्वतीय जीवन की विशिष्टता, लोकदेवताओं के प्रति श्रद्धा, सामुदायिक जीवन की भावना तथा प्रकृति के प्रति सम्मान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। लोक साहित्य इन सभी तत्वों को संरक्षित एवं अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है।
इस प्रकार, उत्तराखंड का लोक साहित्य न केवल उसकी सांस्कृतिक विरासत का अमूल्य भंडार है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए लोक परंपराओं, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण साधन भी है।
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