एक कहानी यह भी:स्त्री अस्मिता का सामाजिक दस्तावेज़
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बीसवीं सदी के अंतिम दशकों का वैश्विक और भारतीय साहित्यिक परिदृश्य एक युगांतकारी परिवर्तन का साक्षी रहा है। इस दौर में साहित्य के केंद्र में वे विमर्श उभरकर आए, जिन्हें सदियों से वर्चस्ववादी सत्ता संरचनाओं ने हाशिए पर धकेल रखा था। स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और हिजड़ा समुदाय जैसे वंचित समूहों ने अपनी अस्मिता की खोज और सत्ता-केंद्रित सामाजिक जकड़न के विरुद्ध स्वर मुखर करना प्रारंभ किया। इन ‘अस्मितामूलक विमर्शों’ के मूल में वह पीड़ा, दमन और यथार्थ अनुभव थे, जिन्हें पारंपरिक साहित्य ने प्रायः उपेक्षित किया था। यह आलेख बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उभरे ‘अस्मिता विमर्श’ और विशेषकर स्त्री आत्मकथाओं के माध्यम से हाशिए के समुदायों की अभिव्यक्ति का विश्लेषण करता है। साहित्य में आत्मकथा केवल निजी जीवन का वृत्तांत न रहकर एक राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज़ बन गई है, जो दमित वर्गों को इतिहास में दर्ज होने का अवसर प्रदान करती है।
भारतीय समाज में स्त्री का संघर्ष ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ की दोहरी मार झेलने जैसा है, जहाँ जाति और जेंडर के हित परस्पर गुँथे हुए हैं। यह आलेख बुद्धकालीन ‘थेरियों’ से लेकर आधुनिक लेखिकाओं तक की लंबी परंपरा को रेखांकित करता है। विशेष रूप से मन्नू भंडारी की आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी’ के माध्यम से यह पड़ताल की गई है कि कैसे एक शिक्षित और स्वावलंबी स्त्री को भी पुरुष के सामंती अहं और वैवाहिक संस्था के भीतर अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ता है। आलेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि आत्मकथात्मक लेखन किस प्रकार हाशिए की आवाज़ों को समाज के मुख्य विमर्श में लाकर उन्हें इतिहास में दर्ज होने का अधिकार प्रदान करता है। आलेख का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि स्त्री आत्मकथाएँ केवल पीड़ा का बयान नहीं, बल्कि वर्चस्ववादी संस्कृति के विरुद्ध एक कड़ा प्रतिरोध हैं।
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