हिन्दी रंगमंच में राजनीतिक विचारधारा और जनसरोकार
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हिन्दी रंगमंच भारतीय समाज की चेतना, संघर्ष और परिवर्तनशील प्रवृत्तियों का एक सशक्त माध्यम रहा है, जिसने समय-समय पर सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। विशेष रूप से राजनीतिक विचारधारा और जनसरोकारों के संदर्भ में हिन्दी नाटक और रंगमंच ने न केवल समाज की समस्याओं को उजागर किया है, बल्कि वैचारिक प्रतिरोध, जागरूकता और परिवर्तन की दिशा भी प्रदान की है। इस शोध पत्र में हिन्दी रंगमंच के विकासक्रम का समग्र विश्लेषण करते हुए यह अध्ययन किया गया है कि विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों-विशेषकर भारतेन्दु युग, प्रसाद युग, स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-उपरांत काल से लेकर समकालीन रंगमंच तक-राजनीतिक विचारधाराओं ने किस प्रकार रंगमंच की संरचना, विषयवस्तु और अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया। साथ ही, यह भी विवेचन किया गया है कि नाटककारों ने अपने नाटकों के माध्यम से जनजीवन की जटिल समस्याओं, जैसे सामाजिक असमानता, राजनीतिक शोषण, लोकतांत्रिक विडंबनाएँ, स्त्री-विमर्श और हाशिये के वर्गों के संघर्षों को किस प्रकार प्रस्तुत किया है। अध्ययन में प्रमुख नाटककारों के कार्यों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि हिन्दी रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त वैचारिक मंच है, जो समाज में संवाद, आलोचना और परिवर्तन की प्रक्रिया को सक्रिय करता है। यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि हिन्दी रंगमंच एक जीवंत लोकतांत्रिक मंच के रूप में कार्य करता है, जो सत्ता, समाज और व्यक्ति के बीच निरंतर संवाद स्थापित करते हुए सामाजिक चेतना को विकसित करने और जनसरोकारों को अभिव्यक्ति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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