आधुनिक हिन्दी नाटकों में राजनीतिक चेतना का स्वरूप
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आधुनिक हिन्दी नाटकों में राजनीतिक चेतना का स्वरूप सत्ता, समाज, लोकतंत्र, जनसंघर्ष और प्रतिरोध जैसे विविध आयामों के माध्यम से उभरकर सामने आता है। आधुनिक हिन्दी नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने का एक प्रभावशाली माध्यम भी है। स्वतंत्रता पूर्व नाटकों में जहाँ राष्ट्रीय चेतना, औपनिवेशिक शासन का विरोध और सांस्कृतिक गौरव प्रमुख थे, वहीं स्वतंत्रता के बाद के नाटकों में लोकतांत्रिक व्यवस्था की विसंगतियाँ, भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग और सामाजिक असमानता जैसे विषय प्रमुख हो गए। भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और हबीब तनवीर जैसे नाटककारों ने अपने नाटकों में राजनीतिक चेतना को प्रत्यक्ष और प्रतीकात्मक दोनों रूपों में व्यक्त किया। ‘अंधेर नगरी’, ‘अंधा युग’, ‘आधे-अधूरे’ और ‘चरणदास चोर’ जैसे नाटक राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरियों, नैतिक पतन और आम जनता के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। आधुनिक हिन्दी नाटकों में लोकतंत्र की विडंबनाएँ, जनमत का दुरुपयोग, चुनावी राजनीति, प्रशासनिक विफलता तथा न्याय व्यवस्था की कमजोरियाँ भी प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं। इसके अतिरिक्त, नाटककारों ने व्यंग्य, प्रतीक, रूपक और संवाद शैली के माध्यम से राजनीतिक चेतना को अधिक प्रभावशाली बनाया है। स्त्री पात्रों की भूमिका भी राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण रूप से उभरती है। इस प्रकार आधुनिक हिन्दी नाटक समाज को जागरूक करने, अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध उत्पन्न करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।
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