अकबर की सुलह-ए-कुल नीति और धार्मिक सहिष्णुता : एक ऐतिहासिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन
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सारांश (Abstract) |
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मुगल सम्राट अकबर (1556–1605) भारतीय इतिहास के ऐसे शासक माने जाते हैं जिन्होंने शासन व्यवस्था में धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। उनकी “सुलह-ए-कुल” (Sulh-i-Kul) नीति, जिसका अर्थ ‘सर्वत्र शांति’ या ‘सबके साथ शांति’ है, एक ऐसी प्रशासनिक और दार्शनिक अवधारणा थी जिसने विविध धर्मों और संस्कृतियों को एकजुट करने का प्रयास किया। इस नीति के अंतर्गत अकबर ने न केवल विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, बल्कि उन्हें शासन व्यवस्था में समान अवसर भी प्रदान किए। जजिया कर का उन्मूलन, इबादतखाना की स्थापना, तथा विभिन्न धर्मों के विद्वानों के बीच संवाद की परंपरा इस नीति के प्रमुख तत्त्व थे। यह शोध-पत्र अकबर की सुलह-ए-कुल नीति के तत्त्व, उसके महत्त्व, और उसके माध्यम से विकसित धार्मिक सहिष्णुता की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करता है। साथ ही यह अध्ययन इस बात की भी जाँच करता है कि इस नीति ने मुगल प्रशासन, समाज और सांस्कृतिक समन्वय पर क्या प्रभाव डाला। इस शोध में गुणात्मक पद्धति का उपयोग किया गया है, जिसमें ऐतिहासिक ग्रंथों, शोध-पत्रों और द्वितीयक स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि अकबर की सुलह-ए-कुल नीति न केवल तत्कालीन समय में शांति और स्थिरता का आधार बनी, बल्कि भारतीय समाज में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा को भी सुदृढ़ किया। |
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अतः यह नीति आज के बहुलतावादी समाज के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रेरणादायक सिद्ध होती है। कुंजी शब्द (Keywords) : अकबर, सुलह-ए-कुल, धार्मिक सहिष्णुता, मुगल प्रशासन, दीन-ए-इलाही, इबादतखाना, सांस्कृतिक समन्वय |
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- Is supplement to
- Journal: 2456-6713 (EISSN)
Dates
- Accepted
-
2025-07-05ok