Published March 4, 2026 | Version v1
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समकालीन हिंदी रंग- प्रयोग और पहचान संबंधी नाट्य-प्रस्तुतियाँ

  • 1. विवेकानंद महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, भारत

Description

यह शोधपत्र समकालीन हिंदी रंगमंच के माध्यम से धार्मिक व जातीय पहचान और उससे उत्पन्न सांस्कृतिक संघर्ष जटिलताओं का विश्लेषण करता है सैमुएल हटिंगटन के 'सभ्यताओं के संघर्ष' के सिद्धांत और 9/11 के बाद की वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में, यह पत्र बताता है कि कैसे पहचान-आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रह मानवीय संवेदनाओं को विकृत कर रहे हैं । शोधपत्र में 'खामोशी सीली सीली', 'मैं हूँ यूसुफ और ये है मेरा भाई', 'फाइनल सोल्यूशन' और 'लोकल फॉरनर' जैसे नाटकों की समीक्षा की गई है ये प्रस्तुतियाँ कश्मीरी पंडितों के पलायन, उनकी त्रासदी, गुजरात दंगों की नफरत और पूर्वोत्तर भारतीयों के प्रति नस्लीय भेदभाव जैसे गंभीर मुद्दों को उजागर करती हैं निष्कर्षतः, यह शोधपत्र भारतीय समाज के वैचारिक पाखंड और आंतरिक भेदभाव की आलोचना करता है और रंगमंच को सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ एक सशक्त, परिवर्तनकारी और संवादपरक माध्यम के रूप में स्थापित करता है

 

बीजशब्द: सांप्रदायिकता, नस्लीय पहचान का संकट, समकालीन हिंदी रंगमंच, पूर्वाग्रह, नागरिक अधिकार

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