घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 और लिविंग संबंध: महिला साथी के अधिकार
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भारत में पारिवारिक एवं अंतरंग संबंधों के भीतर होने वाली हिंसा को लंबे समय तक “निजी क्षेत्र” का विषय माना जाता रहा, जिसके कारण महिलाओं के लिए त्वरित संरक्षण, सुरक्षित आवास तथा आर्थिक सहारा प्राप्त करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (पीडब्लूडीवीए) ने घरेलू हिंसा की परिभाषा को शारीरिक क्षति तक सीमित न रखते हुए यौन, मौखिक/भावनात्मक एवं आर्थिक दुर्व्यवहार तक विस्तारित किया है, तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट के माध्यम से नागरिक प्रकृति की शीघ्र राहतें जैसे संरक्षण आदेश, निवास आदेश, मौद्रिक राहत, अभिरक्षा आदेश और क्षतिपूर्ति प्रदान करने का वैधानिक ढांचा निर्धारित किया है। विशेष महत्व की बात यह है कि अधिनियम “घरेलू संबंध” की परिभाषा में “विवाह-स्वरूप संबंध” (विवाह की प्रकृति में संबंध) को सम्मिलित करता है, जिसके फलस्वरूप ‘लिव-इन’ संबंधों में रह रही महिलाओं को भी न्यायालय द्वारा विकसित मानदंडों की पूर्ति की स्थिति में कानूनी संरक्षण उपलब्ध हो सकता है। यह अध्ययन पीडब्लूडीवीए के वैधानिक प्रावधानों, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित परीक्षणों (विशेषतः वेलुसामी बनाम पटचैम्मल तथा इंद्रा सरमा बनाम वीकेवी सरमा) और निवास/राहत संबंधी न्यायशास्त्र के आधार पर ‘लिव-इन’ महिला साथी के अधिकारों का विश्लेषण करता है। साथ ही, नैतिकतावादी न्यायिक दृष्टिकोण की सीमाएँ, प्रमाण-संग्रह संबंधी व्यावहारिक कठिनाइयाँ, “विवाह-स्वरूप” की संकीर्ण व्याख्या तथा सामाजिक कलंक से उत्पन्न बाधाओं पर आलोचनात्मक विमर्श प्रस्तुत करते हुए समावेशी सुधार-सुझाव भी प्रस्तावित किए गए हैं।
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