भारतीय राजनीति में जाति की भूमिका का अध्ययन- प्रेम कुमार, डा0 विजीश रोनित साइमन
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भारत की आजादी के कई दशकों बाद भी विरासत में प्राप्त कुछ परम्परागत सामाजिक तत्त्व आज भी जीवंत हैं। इन तत्त्वों के पोषक संस्थाओं में जाति-व्यवस्था प्रमुख है। आधुनिकीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार के बाद भी हम जाति व्यवस्था के घेरे में बन्द है, जिसके कारक भारतीय समाज में छुआ-छूत, भेदभाव, ऊँच-नीच जैसे कु-प्रचलन व्यवहार में आज भी विद्यमान है। जाति एक बन्द वर्ग है। जाति व्यवस्था में समाज का खण्डात्मक विभाजन होता है, जिसमें समाज के सदस्यों को उच्चता एवं निम्नता के स्तरों में विभाजित कर दिया जाता है। जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित है, जो जीवनकाल से शुरू होता है और आजीवन जिन्दा रहता है। इसीलिए जाति एक प्रदत्त प्रस्थिति है। जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के इतिहास के बारे में विद्वानों के मतों में एकता नहीं है। वैदिककाल में प्रचलित वर्ण व्यवस्था का परिवर्तित स्वरूप ही जाति व्यवस्था है। हालांकि दोनों व्यवस्थाओं (वर्ण और जाति) का तुलनात्मक अध्ययन करते है, तो ज्ञात होता है कि वर्ण व्यवस्था के स्वरूप में और वर्तमान जाति व्यवस्था के स्वरूप में काफी भिन्नताएँ है।
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Prem Kumar and Syman- Dec 2025.pdf
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