वैश्विक बाजार में गांधी का 'स्वदेशी': एक सामयिक चिंतन
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- 1. राजनीति विज्ञान, ल. ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
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वर्तमान वैश्वीकरण के युग में, जहाँ एक ओर ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा मजबूत हो रही है वहीं दूसरी ओर असमानता, पर्यावरणीय क्षरण और सांस्कृतिक एकरूपता जैसी गंभीर चुनौतियाँ उभरी हैं, ऐसे में महात्मा गांधी का ‘स्वदेशी’ सिद्धांत एक गहन और प्रासंगिक दर्शन के रूप में सामने आता है। स्वदेशी को महज संरक्षणवाद न समझकर एक समग्र जीवन दृष्टि के रूप में देखना चाहिए, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था, नैतिक उपभोग, पर्यावरणीय स्थिरता और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देता है। COVID-19 महामारी जैसी वैश्विक घटनाओं ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की नाजुकता और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के महत्व को उजागर किया है, जो स्वदेशी के सिद्धांतों की व्यावहारिक उपयोगिता सिद्ध करता है। गांधी का दृष्टिकोण अलगाववादी नहीं बल्कि ‘ग्लोकलाइजेशन’ का समर्थक है, जहाँ वैश्विक सहयोग और स्थानीय आत्मनिर्भरता के बीच एक स्वस्थ संतुलन से ही एक न्यायपूर्ण, समावेशी और टिकाऊ वैश्विक व्यवस्था का निर्माण संभव है। अतः स्वदेशी पीछे हटने का नहीं, बल्कि एक संतुलित भविष्य की ओर बढ़ने का आह्वान है।
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