महात्मा गांधी के सामाजिक न्याय संबंधी विचार: एक अध्ययन
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- 1. महंत अवेद्यनाथ राजकीय महाविद्यालय जंगल कौडिया, गोरखपुर,उत्तर प्रदेश, भारत
Description
महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेता होने के साथ-साथ एक दूरदर्शी सामाजिक दार्शनिक, नैतिक चिंतक एवं युगप्रवर्तक समाज सुधारक थे। उनका संपूर्ण जीवन और चिंतन सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा, समानता, करुणा तथा नैतिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों पर आधारित रहा। गांधीजी का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई भी अर्थ तब तक पूर्ण नहीं होसकता, जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति-जिसे उन्होंने ‘अंतिम जन’ या ‘अंत्योदय’ कहा-को सामाजिक, आर्थिक और नैतिक न्याय प्राप्त न हो। उनके अनुसार सामाजिक न्याय केवल संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के नैतिक उत्थान, आत्मसंयम और सामाजिक कर्तव्यबोध से गहराई से जुड़ा हुआ है।
गांधीजी ने सामाजिक न्याय की अवधारणा को सत्य और अहिंसा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों से जोड़ा। उन्होंने जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, आर्थिक विषमता, लैंगिक भेदभाव और धार्मिक असहिष्णुता को सामाजिक अन्याय के प्रमुख कारण माना तथा इनके उन्मूलन के लिए नैतिक परिवर्तन और अहिंसक संघर्ष का मार्ग प्रस्तुत किया। ट्रस्टीशिप सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने आर्थिक न्याय का एक वैकल्पिक मॉडल दिया, जिसमें धन और संसाधनों को समाज की धरोहर मानते हुए उनके न्यायपूर्ण उपयोग पर बल दिया गया है। इसी प्रकार श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के प्रति उनका दृष्टिकोण सामाजिक न्याय की व्यापक और समावेशी समझ को दर्शाता है।
प्रस्तुत शोध-पत्र महात्मा गांधी के सामाजिक न्याय संबंधी विचारों का सैद्धांतिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसमें गांधीजी के जीवन-दर्शन, सामाजिक चेतना, जाति एवं अस्पृश्यता संबंधी विचार, आर्थिक न्याय, श्रमिक-किसान हित, महिला सशक्तिकरण, धार्मिक सहिष्णुता तथा शिक्षा की भूमिका का विस्तृत विवेचन किया गया है। साथ ही, समकालीन सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में गांधीवादी सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता का मूल्यांकन किया गया है। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि आज के वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और बढ़ती सामाजिक विषमताओं के दौर में भी गांधीजी के सामाजिक न्याय संबंधी विचार भारतीय समाज ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक और उपयोगी हैं।
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Dates
- Submitted
-
2026-01-05
- Accepted
-
2026-01-21
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References
- गांधी, मोहनदास करमचंद. 'हिंद स्वराज'. अहमदाबादः नवजीवन प्रकाशन, 2015, पृ. 45-52 गांधी, मोहनदास करमचंद. 'सत्य के प्रयोग या आत्मकथा'. अहमदाबादः नवजीवन प्रकाशन, 2014, पृ. 112-118, 203-210 गांधी, मोहनदास करमचंद. 'हरिजन'. अहमदाबादः नवजीवन प्रकाशन, 2016, पृ. 35-41 Iyer, Raghavan- "The Moral and Political Thought of Mahatma Gandhi"- New Delhi: Oxford University Press] 2000, pp- 89–104 Bondurant, Joan V- "Conquest of Violence: The Gandhian Philosophy of Conflict"- Princeton: Princeton University Press, 1988, pp- 56–63 शर्मा, रामआश्रय. 'गांधी दर्शन और सामाजिक न्याय'. नई दिल्लीः राजकमल प्रकाशन, 2012, पृ. 78-92 दत्ता, विद्या. 'भारतीय समाज और गांधी'. नई दिल्लीः वाणी प्रकाशन, 2010, पृ. 121-134 Chandra, Bipan- India's Struggle for Independence- New Delhi: Penguin Books, 2009, pp- 156–162