Published January 30, 2026 | Version v1
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परम्परा और परिवर्तन के संगम के परिप्रेक्ष्य में भक्तिकालीन काव्यों में चित्रित ज्ञान

Description

भक्तिकालीन काव्य साहित्य भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण संगम को दर्शाता है। इस काल में भक्त कवि अपने समय की सामाजिक, धार्मिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करते हुए, अपने काव्य के माध्यम से ज्ञान का प्रचार करते हैं। भक्तिकाल में काव्य का मुख्य उद्देश्य ईश्वर की भक्ति, मानवता की सेवा और सामाजिक न्याय को स्थापित करना था। संत कवियों ने अपनी रचनाओं में गहन दार्शनिकता और सामाजिक सचेतना का समावेश किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान और भक्ति में गहन संबंध है।

कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सरल भाषा का प्रयोग किया, जिससे ज्ञान की बातें आम जन तक पहुंच सकें। संत तुकाराम, कबीर, मीराबाई और तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने अपने ग्रंथों में ईश्वर का प्रेम, समुदाय की एकता, और असमानता के खिलाफ आवाज उठाई। इस प्रकार, भक्तिकालीन काव्य ने न केवल भक्ति का प्रचार किया, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस युग के काव्य में परंपराओं और परिवर्तन दोनों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह काव्य ज्ञान का वह तत्व है, जो सामाजिक सद्भावना को बढ़ावा देता है और मानवता के उत्थान की दिशा में प्रेरित करता है।

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