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भारत के प्रमुख जनजातीय पारंपरिक काष्ठ कला का विश्लेषणात्मक अध्ययन

  • 1. दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) दयालबाग, आगरा,उत्तर प्रदेश, भारत
  • 2. दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) दयालबाग, आगरा, उत्तर प्रदेश, भारत

Description

कला की उत्पत्ति अति प्राचीन काल से मानी गयी है कला का प्रारंभिक स्वरूप हमें प्रागैतिहासिक काल की कलाओं में देखने को मिलते हैं मनुष्य का विकास जैसे-जैसे होता गया मनुष्य और सभ्य बनता गयाउसी प्रकार कला भी समय के साथ धीरे-धीरे अपना विकसित रूप ग्रहण करने लगी, जो आगे चलकर स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला एवं संगीत कला आदि इन रूपों में सामने आई इस प्रकार और विचार धाराओं का विकास हुआ। भारतीय कला में धार्मिक तथा दार्शनिक मान्यताओं की अभिव्यक्ति से ही की गई है फिर चाहे वह प्रस्तर कालीन कला हो या सिंधु घाटी सभ्यता, लघु चित्रण परम्परा या वैदिक काल से जुडी परम्पराओं से सम्बंधित कला, भवन हो या अत्याधुनिक समकालीन कला मानव आदिकाल से ही प्रकृति व ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए निरंतर प्रयास करता रहा है विजय, उल्लास, इच्छा, उदासीनता, आनन्द आदि मनोभावों को उसके सृजनशील मन से विभिन्न विधाओं व अनेक माध्यमों में अभिव्यक्ति किया। कला जीवन की स्थानापन्न है अथवा आसपास की दुनिया से मनुष्य का संतुलन स्थापित करने वाला साधन है इस विचार में कला के स्वरूप और उसकी जरूरत की आंशिक पहचान निहित है कलाकार होने के लिए अनुभव को पकड़ना उस पर अधिकार करना, उसे स्मृति में रूपांतरित करना और स्मृति को अभिव्यक्ति में वस्तु के रूप में रूपांतरित करना आवश्यक है कला रूपों का निर्माण करती है समग्र रूप राशि ही कला है कला के प्रांगण में स्वर्ग के देव दूत तक संयम मर्यादा का संदेश लेकर निरंतर धरती पर उतरते रहे हैं। किसी भी देश की संस्कृति का दर्पण वहां की कला होती हैं, जैसे- भारतीय कला भी यहां के जीवन का दर्पण है भारत में देखा जाए तो धर्म तथा दर्शन, अर्थ तथा कामसौंदर्य तथा कुरूपता एवं बौद्धिकता, प्रकृति तथा दृश्य, राजा तथा प्रजा, युद्ध एवं शांति, स्वामी तथा सेवक, जड़ एवं चेतन, श्रमजीवी तथा बुद्धिजीवी, दर्शनों की गंभीरता और विद्युत की हास्य व्यंग सदाचार का आदर्श तथा विषयों का चरम विलास, योग तथा भोग ,चरम तथा निराशा एवं प्रखर कला विलास इत्यादि देखने को मिलते हैं।

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भारत के प्रमुख जनजातीय पारंपरिक काष्ठ कला का विश्लेषणात्मक अध्ययन.pdf

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Dates

Submitted
2026-01-02
Accepted
2026-01-23

References

  • वासुदेवशरण अग्रवाल – भारतीय कला राधा कमल मुखर्जी – भारतीय कला का विकास डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित – भारतीय कला और संस्कृति वीरबाला भावसार – आदिवासी कला शर्मा, रामनारायण. (2012). भारतीय लोक एवं जनजातीय कला. नई दिल्ली : राष्ट्रीय पुस्तक न्यास। वर्मा, शिवप्रसाद. (2010). भारत की जनजातीय संस्कृति. भोपाल : मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी। ए. आर. एन. श्रीवास्तव – जनजातीय संस्कृति साहू, सूरजपाल. (2016). मूर्ति कला का इतिहास. जयपुर : रावत पब्लिकेशन। मिश्रा, कृष्णदेव. (2008). लोककला और जनजातीय परंपराएँ. वाराणसी : विश्वभारती प्रकाशन। शांडिल्य, महेश - काष्ठ कला www.wikipedia.com www.amarujala.com www.tribleart.com https://images.app.goo.gl/v2hk5hQu3onx4xYc9 https://images.app.goo.gl/eS3wB12eCh5mPcHc9