झारखंड राज्य की पृष्ठभूमि – झारखंड आंदोलन और राज्य निर्माण
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शोध सार-भारतीय उपमहाद्वीप की विविधताओं में झारखंड एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अत्यंत विशिष्ट रही है। यहाँ की धरती पर आदिम समाजों ने अपनी संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा। झारखंड का भूगोल घने जंगलों, पर्वतों, खनिज संपदा और आदिवासी संस्कृति से परिपूर्ण है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही प्राकृतिक संसाधनों के कारण आकर्षण का केंद्र रहा है, किंतु यहाँ के मूल निवासियों ने हमेशा बाहरी हस्तक्षेप और शोषण का प्रतिरोध किया। यही कारण है कि झारखंड आंदोलन केवल एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों की पुनर्प्राप्ति का आंदोलन भी था।झारखंड की सामाजिक पृष्ठभूमि पर यदि दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँ की समाज व्यवस्था मुख्यतः आदिवासी संस्कृति पर आधारित रही है। संथाल, मुंडा, उरांव, हो, बिरहोर, असुर और अन्य अनेक जनजातियाँ यहाँ की पहचान रही हैं। इन समुदायों का सामाजिक जीवन सामुदायिकता, सामूहिक श्रम और प्राकृतिक संसाधनों के साझा उपयोग पर आधारित रहा। जंगल, जमीन और जल इनके जीवन के मूल आधार रहे हैं। प्रकृति से गहरा जुड़ाव इनके गीतों, नृत्यों, त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों में दिखाई देता है। किंतु औपनिवेशिक शासन और बाद में स्वतंत्र भारत की विकास नीतियों ने इन परंपराओं को लगातार चुनौती दी।ब्रिटिश शासन के दौरान झारखंड क्षेत्र का दोहरा शोषण हुआ। एक ओर अंग्रेजों ने यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया और दूसरी ओर जमींदारी प्रथा ने आदिवासियों को उनकी भूमि से बेदखल किया। कोयला, लोहा, अभ्रक और अन्य खनिजों से भरपूर यह क्षेत्र औद्योगिकीकरण का केंद्र बना, लेकिन यहाँ की जनता हाशिए पर धकेल दी गई। अंग्रेजों के खिलाफ यहाँ लगातार विद्रोह हुए। 1771 का पहाड़िया विद्रोह, 1784 का तिलका मांझी आंदोलन, 1831 का कोल विद्रोह, 1855 का संथाल हूल और 1900 का बिरसा मुंडा आंदोलन झारखंड की सामाजिक-राजनीतिक चेतना के महत्वपूर्ण मील-पत्थर रहे। इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि झारखंड के लोग अपनी अस्मिता और संसाधनों की रक्षा के लिए सदैव संघर्षशील रहे हैं।
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