वैदिक वाङ्मय में रुद्र-शिवतत्त्व का विमर्श
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“न भूमिर्न चापो न हेनिर्न वायु
न चाकाश आस्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
न ग्रीष्मो न शीतो न देशो न वेषो
न यास्ति मूर्तिस्त्रीमूर्ति तमीडे ॥” (श्रीवेदसारशिवसत्त्वस्तोत्रम्)
सुदूर अतीत में जब विश्व के अधिकांश सभ्य देश सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से गहन तिमिर में आवृत्त थे तथा ज्ञान की प्रदीप्त ज्वाला के अभाव में अज्ञानता के अंधकार में लगभग पूर्णतः निमग्न थे, उसी समय भारतभूमि पर ज्ञानालोकधर्मी वेद–सूर्य का उदय हुआ। वेद को केन्द्र में रखकर ही विश्व के प्राचीनतम साहित्य, अर्थात् वैदिक साहित्य, का विकास हुआ। इस साहित्य ने अतीत के किसी रहस्यमय, निनादहीन, निःशब्द क्षण में स्वाभाविक रूप से आत्मप्रकाश किया, जो आज भी चिर रहस्यमय बना हुआ है।
वेद ही भारतीय साहित्य का आद्यतम साक्ष्य तथा सनातन धर्म का सर्वप्राचीन पवित्र ग्रंथ है। सनातनी परंपरा में वेद को “अपौरुषेय” तथा “नैर्वक्तिक” अर्थात् रचयिताशून्य माना गया है।
“इष्टप्राप्त्यनिष्ट-परिहारयोरलौकिकम् उपायं यो ग्रन्थो वेदयति, स वेदः” (तैत्तिरीय संहिता)
वैदिक युग में प्रकृति के शान्त स्वरूप से उत्पन्न कल्याणकारी चिन्तन ने ही मानव–मन में मंगलमयी चेतना का संचार किया। इसी चेतना का प्रतीक रूप है शिव। वैदिक परंपरा में संहार एवं उग्रता के देवता ‘रुद्र’ तथा करुणा एवं कल्याण के अधिष्ठाता ‘शिव’—दोनों ही देवत्व एक-दूसरे में अभिन्न रूप से मिलकर मानव धर्मविश्वास में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार रुद्र और शिव का समन्वित स्वरूप भारतीय अध्यात्म में विनाश और सृजन, भय और करुणा, उग्रता और मंगल—सभी के संतुलन का प्रतीक बनकर रह गया।
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