भाषा का अभिकालानात्मक भाषावैज्ञानिक अध्ययन
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- 1. हिंदी विभागाध्यक्ष श्रीपतराव चौगुले आर्ट्स अंड सायन्स कॉलेज कोतोली
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सारांश
भाषावैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में वर्तमान काल में नई – नई कल्पनाएँ उभरकर आ रही है। उसे संगणक की सहायता प्राप्त होने से बहुत ही गति से इस भाषावैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में परिवर्तन होने लगा है। उसमें भाषा के कारण किसी भी प्रकार की असुविधा उत्पन्न न हो इसलिए संगणक पर अनुवाद प्रक्रिया, शब्दकोश की सुविधा की गई है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति किसी भी भाषा की जानकारी आसान रूप में प्राप्त कर सकता है। भाषा का संगणक पर अध्ययन करने की बात करने पर पहले शब्दकोश तथा शब्द विश्लेषण की आवश्यकता महसूस होती है। अत: प्राकृतिक भाषा संसाधन के क्षेत्र में संगणक के बढ़ते उपयोग से कोश निर्माण की तकनीक में नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। प्रारंभ में शब्दकोश का संबंध केवल अर्थ तक सीमित था। परंतु आज उसके स्वरूप में परिवर्तन हुआ है। प्रत्येक शब्द के प्रकट और अप्रकट दोनों रूपों का समावेश किया जाता है।
भाषा-प्रोसेसिंग और अभिकलनात्मक भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) आज सूचना-प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा भाषा-प्रबंधन प्रणालियों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हिंदी, भारत की एक प्रमुख भाषा होने के कारण, इसके लिए प्रभावी अभिकलनात्मक उपकरणों और संसाधनों का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है। परंतु हिंदी भाषा को लेकर अभी भी संसाधन, मॉडल, परीक्षण डेटा और शोध-धारा की कमी है। हिंदी भाषा अनेक लिंग्विस्टिक (भाषायी) विशेषताओं से परिपूर्ण है — जैसे समृद्ध व्याकरणात्मक रूप-रचना (morphology), बहुल रूप (inflection), समास (compounding) एवं देवनागरी लिपि। इन विशेषताओं के कारण हिंदी की अभिकलनात्मक प्रोसेसिंग में विशिष्ट चुनौतियाँ सामने आती हैं।
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