ममता कालिया का 'दौड़' उपन्यास: आजीविकावाद संदर्भ
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हिंदी उपन्यास परंपरा ने स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद से अनेक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विमर्शों को अपनी कथावस्तु का केंद्र बनाया है। बदलते सामाजिक परिदृश्य, परिवारिक संबंधों, स्त्री-जीवन की जटिलताओं और रोज़गार–संघर्षों को हिंदी उपन्यासकारों ने गहराई से चित्रित किया है। इसी क्रम में ममता कालिया का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे हिंदी की उन रचनाकारों में हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं में मध्यवर्गीय जीवन की पेचीदगियों, स्त्री-जीवन की विडंबनाओं और रोज़गार की निरंतर भागदौड़ को कथा का आधार बनाया। इनमें खासकर दौड़ उपन्यास ने हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान अर्जित किया है। ‘दौड़’ उपन्यास बाज़ार के दबाव और आजीविकावाद से जनित सांस्कृतिक विघटन, संबंधों के विघटन और मानवीय भावनाओं की क्षति का यथार्थ चित्रण करता है। इसमें आजीविका-संबंधित दौड़ का बारीकी से विश्लेषण देखने को मिलता है। ममता कालिया का उपन्यास 'दौड़' आधुनिक भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में आजीविका की चुनौतियों का सशक्त चित्रण करता है। यह शोध आलेख उपन्यास में आजीविका के प्रश्नों की पड़ताल करता है, जिसमें बाजारवाद, आर्थिक उदारीकरण, और युवा पीढ़ी की महत्वाकांक्षाओं का विश्लेषण किया गया है।
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