दलित साहित्य और संविधान: संविधान, अधिकार और अस्तित्व
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- 1. एम. ए. बी. एड, सेट, पी. एचडी (कार्यरत) सहायक प्राध्यापक दत्ताजीराव कदम आर्टस, सायन्स एण्ड कॉमर्स कॉलेज इचलकरंजी
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दलित साहित्य हिंदी साहित्य का एक सशक्त और परिवर्तनकारी अंग है, जो समाज में व्याप्त शोषण, अन्याय, भेदभाव और असमानता के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक है। यह साहित्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि एक सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय आंदोलन है, जो दलित वर्ग की वास्तविक पीड़ा, अस्मिता और अधिकारों की मांग को स्वर देता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले और गौतम बुद्ध के विचारों से प्रेरित यह साहित्य समानता, न्याय और स्वतंत्रता पर आधारित समाज की स्थापना का लक्ष्य रखता है।
भारतीय संविधान ने दलितों को समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मौलिक अधिकार प्रदान किए हैं। अनुच्छेद 14 से 18 तक के प्रावधानों के अंतर्गत अस्पृश्यता का उन्मूलन, समान अवसर और शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 ने दलितों के अधिकारों की रक्षा को कानूनी रूप दिया है।
दलित साहित्य और संविधान, दोनों ही दलित समाज के अस्तित्व, आत्मसम्मान और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए परस्पर पूरक हैं। एक ओर संविधान ने दलितों को अधिकार और सुरक्षा दी है, तो दूसरी ओर दलित साहित्य ने उनके जीवन की वास्तविकताओं, संघर्षों और आकांक्षाओं को स्वर प्रदान किया है। यह साहित्य समाज में समता, न्याय और मानवता के मूल्यों को सशक्त करने का कार्य करता है।
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