Published September 30, 2025 | Version v1
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विशेष बच्चों के चित्रों पर बसंत ऋतु का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

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कलाकार जब किसी कलाकृति को कैनवस पर उकेर रहा होता है तो वह अपने तय समय की संवेदना को भी बन रहा होता है। ऐसा करते वह अतीत को भी कलाकृति में आमंत्रित कर रहा होता है तो भविष्य के स्वरों को भी उसमें संजो रहा होता है। कलाकार के लिए वह समय भी महत्त्वपूर्ण होता है, जिस समय वह अपनी सर्जना को कैनवस पर परोट रहा होता है। कलाकृति के जरीए समय की इस बुनावट में वह समय की तमाम विसंगतियों, दुख, त्रासदियों, सुखद स्थितियों की संकल्पना को सामाजिक सरोकारों के साथ उद्घाटित करता है। शोध के लिए राजस्थान के जगदम्बा मूकबधिर विद्यालय, श्री गंगानगर के 10 मूकबधिर बच्चों को ड्राइंग शीट तथा कलर दिए। विशेष बच्चों में मूक बधीर बच्चों से जब बसंत के मौसम में चित्र बनवाए गए तो उन्होंने हरे, पीले, संतरी रंगों को बहुत अधिक मात्रा में प्रयोग किया। इनके चित्रों में पतंग उड़ाते हुए बच्चे, बरसात, छाता पकड़े हुए बच्चे, पीला फूल (सूरजमुखी), रंग-रंगीले फूल, गुलदस्ता पकड़े हुए एक लड़की, सूरज, नीला आकाश व खेत आदि विषय देखने को मिले। इन चित्रों में बसंत की खुशहाली दिखाई देती है। कुछ चित्रों में बच्चों ने अपने हाथ का छापा लगाकर अपने मनोरंजक मनोदसा को जाहिर किया अन्य चित्रों में आड़ी-तिरछी रेखाओं के द्वारा चित्र पूर्ण किया जिसमें कोई विशेष विषय वस्तु नहीं थी इन चित्रों में बच्चे ने मन के संवेगों को कागज पर उकेरा है रेखाओं में व्याकुलता, संघर्ष, उत्तेजना, बैचेनी, शक्ति एवं प्रगति दिखाई देती है क्यों कि इनमें से ज्यादातर रेखाएं तिरछी तथा कोणीय है जो अपना स्वभाव लिए हुए है। शोध करते समय कुछ बच्चों के परिजनों तथा कक्षा अध्यापक से जानकारी मिली की बच्चे इन दिनों रोजाना पेंटिग बनाते है जाहिर है इसके पीछे का कारण इन दिनों का वातावरण या बसंत का मौसम ही है।

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