ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारत का कृषक आन्दोलन
Authors/Creators
- 1. शोधार्थी, विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा बिहार
- 2. राजनीति विज्ञान विभाग, ललित नारायण जनता कॉलेज, झंझारपुर
Contributors
Editor:
Description
भारत में कृषक आंदोलनों की परंपरा एक दीर्घकालिक एवं संघर्षशील ऐतिहासिक यात्रा को प्रतिबिंबित करती है, जिसने औपनिवेशिक शासन से लेकर समकालीन लोकतंत्र तक किसानों की आवाज़ को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मंचों पर प्रभावी रूप से स्थापित किया है। इन आंदोलनों का आरंभ ब्रिटिश शासन के दौरान कृषि कर प्रणाली, जबरन नकदी फसलों की खेती तथा जमींदारी शोषण के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध से हुआ। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नील विद्रोह, पाबना आंदोलन एवं दक्कन दंगों जैसे संघर्षों ने ग्रामीण कृषक समाज में राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना के बीज बोए, जिसके फलस्वरूप विविध सामाजिक संगठनों का गठन भी हुआ। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चंपारण और खेड़ा में आयोजित सत्याग्रह ने इस चेतना को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ते हुए एक व्यापक जनांदोलन का रूप प्रदान किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भूदान एवं ग्रामदान आंदोलनों ने भूमि के न्यायपूर्ण वितरण की अवधारणा को समाज के मध्य प्रसारित किया। आगे चलकर 1980 एवं 1990 के दशकों में आर्थिक अधिकारों पर केंद्रित कृषक आंदोलनों-जैसे कि शरद जोशी द्वारा स्थापित 'शेतकरी संगठन'-ने वैश्वीकरण, बाजारीकरण एवं कृषि नीति के अंतर्विरोधों को उजागर किया। इन संघर्षों ने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन को धार प्रदान की, बल्कि कृषक वर्ग की सामाजिक चेतना को भी सुदृढ़ किया। स्वतंत्रता के उपरांत भी कृषि संकट, भूमि सुधारों की विफलता, ऋणग्रस्तता, तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मांग जैसे बहुआयामी मुद्दों ने इन आंदोलनों को निरंतरता प्रदान की। यह ऐतिहासिक यात्रा यह संकेत करती है कि भारतीय कृषक केवल उत्पादनकर्ता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के सक्रिय संवाहक भी रहे हैं। यह आलेख विभिन्न कालखंडों में कृषक आंदोलनों के स्वरूप, कारणों, रणनीतियों एवं प्रभावों की समग्र समीक्षा प्रस्तुत करता है।
Files
x170944.pdf
Files
(1.3 MB)
| Name | Size | Download all |
|---|---|---|
|
md5:8a22759cb88f45623e6dc6d58ff72ed8
|
1.3 MB | Preview Download |