Published September 28, 2025 | Version RRSSH July-Aug.-Sep. 2025

कृषि संकट और किसान आंदोलन का सामाजिक अध्ययन

  • 1. असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग डाॅ॰बी॰आर॰ अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विष्वविद्यालय, महू (म॰प्र॰)

Description

भारत में कृषि क्षेत्र सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। किसानों की सामाजिक स्थिति, उनके अधिकार और जीवन स्तर का न केवल ग्रामीण समाज की संरचना को प्रभावित करता है, बल्कि पूरे राष्ट्र के विकास और सामाजिक समरसता पर भी दिखाई देता है। पिछले कुछ दशकों में कृषि संकट ने ग्रामीण समुदायों में असमानता, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया है। इसके परिणामस्वरूप किसानों के आंदोलनों में वृद्धि हैं हुई जो केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहे बल्कि सामाजिक न्याय, पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष का रूप भी ग्रहण किया। इस शोध का उद्देश्य कृषि संकट और किसान आंदोलनों के सामाजिक पहलुओं का विश्लेषण करना है। यह अध्ययन यह बताता है कि किसान आंदोलन केवल भूमि, मूल्य या सरकारी नीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें सामाजिक चेतना, सामूहिक संघर्ष और समुदायिक संगठन की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। किसान आंदोलन ग्रामीण समाज में नेतृत्व क्षमता, सामूहिक निर्णय और सामाजिक नेटवर्क की मजबूती को दर्शाते हैं। शोध में प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों के माध्यम से किसान आंदोलनों का विश्लेषण किया गया है। सामाजिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि आंदोलनों का उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, सम्मान और सामूहिक शक्ति को मजबूत करना भी है। यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि कृषि संकट और किसान आंदोलन समाज में असमानता, संघर्ष और सामाजिक सुधार के मुद्दों को उजागर करते हैं। अतः किसान आंदोलन और कृषि संकट पर समाजशास्त्रीय अध्ययन न केवल ग्रामीण समाज की समस्याओं और उनके समाधान को समझने में सहायक है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, सामूहिक चेतना और नीति निर्माण में भी प्रासंगिक है। यह शोध कृषि और समाजशास्त्र के बीच गहन संबंध को उजागर करता है और समाज में संतुलन और सुधार की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।

Files

2----6-9.pdf

Files (178.8 kB)

Name Size
md5:2036c7d94d42184cfdfd9cde39fb4b05
178.8 kB Preview Download