दलित स्त्री-विधवा: सामाजिक बहिष्कार और आंतरिक पीड़ा का साहित्यिक चित्रण
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यह शोध पत्र दलित साहित्य में विधवा स्त्रियों की सामाजिक, मानसिक, और भावनात्मक स्थिति का बहुआयामी विश्लेषण करता है। भारतीय समाज में स्त्री-वर्ग ऐतिहासिक रूप से दोयम दर्जे की नागरिक माना गया है, लेकिन जब एक स्त्री दलित समुदाय से संबंध रखती हो और विधवा भी हो, तब वह कई स्तरों पर शोषण और बहिष्कार का शिकार होती है। इस द्विगुणित/त्रिगुणित पीड़ा को समाज अक्सर नज़रअंदाज़ करता है। दलित विधवा स्त्री जातीय, लिंग आधारित, और पारिवारिक उपेक्षा से उत्पन्न अवमानना और अकेलेपन का अनुभव करती है।
यह अध्ययन साहित्यिक कृतियों – विशेषकर आत्मकथात्मक रचनाओं – के माध्यम से इस उपेक्षित वर्ग की पीड़ा को उजागर करता है। अमृता प्रीतम की "रसीदी टिकट", प्रभा खेतान की "अनन्या", ओमप्रकाश वाल्मीकि की "जूठन", और उर्मिला पवार की "आयदान" जैसी रचनाओं में विधवा दलित स्त्रियों की यथार्थ स्थितियों का भावनात्मक, सामाजिक एवं वैचारिक चित्रण मिलता है। यह शोध केवल साहित्यिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से समाज में जागरूकता उत्पन्न करने, दलित स्त्रियों की आवाज़ को मंच प्रदान करने और नीति-निर्माण में इस वर्ग की वास्तविक भागीदारी को सुनिश्चित करने की दिशा में सार्थक पहल करता है। यह शोध पत्र पीड़ा के साथ-साथ प्रतिरोध, आत्मबोध और अस्तित्व की लड़ाई को भी साहित्यिक आधार प्रदान करता है।
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