राधावल्लभ सम्प्रदायः दार्शनिक – सैध्दांतिक भावभूमि
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राधावल्लभ सम्प्रदाय उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन का एक प्रमुख सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में श्रीहित हरिवंश महाप्रभु द्वारा वृंदावन में की गई थी। यह सम्प्रदाय मुख्यतः राधा के परमत्व को स्वीकार करता है और उन्हें ही परब्रह्म मानकर भक्ति करता है। जबकि अधिकांश वैष्णव सम्प्रदायों में भगवान श्रीकृष्ण को परब्रह्म माना जाता है, वहीं राधावल्लभ सम्प्रदाय इस धारणा को उलट कर राधा को सर्वोच्च सत्ता घोषित करता है।
इस सम्प्रदाय की दार्शनिक पृष्ठभूमि में वेदान्त, भक्ति और रस सिद्धान्त का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। राधा को इस सम्प्रदाय में सगुण तथा निर्गुण दोनों रूपों में स्वीकार किया गया है। वे मूल रूप में निर्गुण परब्रह्म हैं, किन्तु भक्तों की भावना के कारण सगुण रूप में लीलाएं करती हैं। राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम को इस सम्प्रदाय ने आध्यात्मिक प्रेम का आदर्श बताया है।
इस सम्प्रदाय का मुख्य आधार रसात्मक भक्ति है, जिसमें भक्त और भगवान के मध्य प्रेम के माधुर्य रस की प्रधानता होती है। यहाँ ज्ञान, योग या कर्म के स्थान पर प्रेम और अनुभूति को साधना का माध्यम माना गया है। राधावल्लभ सम्प्रदाय सहज, सरल, औपचारिकताओं से रहित भक्ति मार्ग को अपनाता है, जो भाव और समर्पण पर आधारित है।
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