भाषा और समाज, हिंदी भाषा पर प्रौद्योगिकी का प्रभाव
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- 1. सहायक आचार्या, हिन्दी विभाग, जैन (मानद विश्वविद्यालय), एस.ओ.एस, जे.सी.रोड, बेंगलोर, कर्नाटक.
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सारांश :-
मेरी भाषा में तोते भी राम राम जब कहते हैं,
मेरे रोम रोम में मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं ।
सब कुछ छूट जाय मैं अपनी भाषा कभी न छोड़ूंगा,
वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोड़ूंगा ।।
मैथिलीशरण गुप्त
भाषिक और सांस्कृतिक रूप से विभाजित विश्व के विभिन्न देशों में सामाजिक,आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास में आनेवाली अनेकानेक व्यावहारिक बाधाओं में भाषा की समस्या एक महत्त्वपूर्ण एवं ज्वलन्त समस्या है। भारत जैसे विविधता प्रधान देश में यह समस्या अपनी चरम सीमा पर है।विश्वभर में नित नई प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है। एक देश दूसरे देश के साथ प्रौद्योगिकी का आदान प्रदान कर रहा है। ऐसे में प्रौद्योगिकी को समझने के लिए जरूरी है कि वह उस भाषा में हो जिसे देश के सबसे अधिक लोग बोलते व समझते हों। हम रोज ऐसी काफी चीजे देखते है जो पहले अंग्रेजी में होती थी और अब उनमें हिंदी शामिल होने लगी। हिंदी को शामिल करना इनके लिए कोई मजबूरी नहीं है बल्कि आवश्यक है। भारत की आधी से ज्यादा आबादी हिंदी को अच्छे से समझती तथा बोलती है। इनके लिए अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी में संवाद करना काफी आसान होता है। आज की प्रौद्योगिकी ने हिंदी को हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बनाने में मदद की है। हिंदी अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। अब हिंदी की परिभाषा और रूपरेखा में बदलाव आया है।
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