Published March 25, 2024 | Version Anthology The Research
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प्रेमचंद साहित्य और हिंदी सिनेमा का अन्तःसम्बन्ध

  • 1. महाराजा मनिंद्र चन्द्र कॉलेज कोलकाता,पश्चिम बंगाल, भारत

Description

This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research"                                                                                                                          URL : http://socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=9137                                                                                                                                              Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)                                                                                                                                                                        Abstract : प्रेमचंद का साहित्य पाठकों की भावनाओं को जाग्रत करता है और सिनेमा भी दर्शक समाज के साथ अपना भावात्मक संबंध स्थापित करता है और जब प्रेमचंद की रचनाएं सत्य  शिव सुंदरम को फिल्म के जरिए हमारे सामने लाती हैं तब सामाजिक जीवन का सत्य जिसमे कष्ट भी है समस्याएं भीआनंद भीसंघर्ष भीजीने की इच्छा ये सब हमें चरित्रों के माध्यम से प्रेमचंद की कहानी और उपन्यासों से निकलकर फिल्म की स्क्रीन पर जीवंत हो उठते हैं। प्रेमचंद का पराधीननिर्धननिरक्षर भारत का सच नजदीक से दिखाई देने लगता है। प्रेमचंद अपने साहित्य में साम्राज्यवादसामंतवादउपनिवेशवादजमींदारी प्रथामहाजनी प्रथाजातिवादपूंजीवाद के जिस भयंकर और कुत्सित रूप का विरोध और प्रतिरोध कर रहे थे वही जब सन् 1934 में निर्देशक मोहन भावनानी के द्वारा मिल मजदूर’ के नाम से या सन् 1963 में श्रीलोक जेटली के निर्देशन पर गोदान’ के नाम से या 1959 में दो बैलों की कथा’ पर आधारित हीरा मोती’ फिल्म के नाम से या सन् 1977 में सत्यजीत राय के निर्देशन पर “शतरंज के खिडाली” फिल्म के नाम से या सन्1977 में मृणाल सेन के निर्देशन पर तेलुगु भाषा में ‘कफ़न’ पर आधारित ‘ओका उरी की कथा’ फिल्म के नाम से या सन्1981 में सत्यजीत रॉय के निर्देशन पर ‘सद्गति’ फिल्म के नाम से या सन् 1938 में कृष्णस्वामी सुब्रमण्यम के निर्देशन पर ‘सेवा सदन’ फिल्म के नाम से फिल्माया गया तब प्रेमचंदद्वारा निर्मित चरित्र मानो और ज्वलंत होकर हमारे सामने बोलने लगे। सिनेमा की शक्ति से प्रेमचंद को इन्कार नहीं था। वे सिर्फ अच्छे विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार चाहते थे चाहे वह साहित्य हो या सिनेमा। एकतरफ जहां वे ‘कजली’ जैसे मनोरंजन करने वाली पुस्तक हैं की कटु आलोचना करते है और उसे साहित्य में शामिल नहीं करते वहीँ दूसरी तरफ वे उस सिनेमा की शक्ति को स्वीकार करते हैं जो आदर्श चरित्रों की सृष्टि करने में सक्षम हो । वस्तुतः प्रेमचंद ने अपने समय के सामाजिक - राजनीतिक - सांस्कृतिक विघटन को साहित्य के माध्यम से कोशिश की है। । मनुष्योन्मुखी संवेदना का विकास उनकी रचनाओं का मूल विषय है जिसके परिणाम- स्वरूप उनका सौन्दर्यबोध और उनकी सौन्दर्य - दृष्टि उनके साहित्य - चिन्तन के स्तर पर फलीभूत होती दिखाई देती है। मनुष्य के संबंधों को मजबूत बनाना प्रेमचंद के रचना - कार्य का ध्येय रहा है और जब यह सिनेमा के साथ जुड़‌कर सामने आता है तब विघटित समय का प्रत्येक मोड़ जीवंत होकर हमारे रोम-रोम को स्पर्श करता है और हम उसी दिशा में उनके आदर्शोन्मुखी और यथार्थोंमुखी चरित्रों की और उन्मुख होते हुए भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्पाठ करने लगते हैं और प्रेमचंद द्वारा दिये गये नये सौन्दर्यशास्त्रीय आयाम से जुड़ जाते हैं |

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प्रेमचंद-साहित्य और हिंदी सिनेमा का अन्त सम्बन्ध.pdf

Additional details

Identifiers

ISSN
2456-4397

Dates

Submitted
2024-03-13
Accepted
2024-03-22

References

  • 1. कुमार डॉ० राकेश, प्रेमचंद एक पुनर्पाठ, हिमाचल बुक्स प्रकाशन, दिल्ली, प्रकाशन वर्ष - 2012, संस्करण - प्रथम, पृष्ठ-42 2. कुमार संदीप, प्रेमचंद और सिनेमा, sahityacinemasetu.com, 31/7/2020 3. मुरारी कृष्ण, प्रेमचंद का साहित्य और सत्यजीत रे का सिनेमा : शब्दों से उभरी सांकेतिकता का फिल्मांकन, https://hindi.theprint.in, 31.7.2021 4. यादव राजेन्द्र, प्रेमचंद की विरासत, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष - 2006, पृ० 9 5. अरविंदाक्षन ए, भारतीय कथाकार प्रेमचंद, आनंद प्रकाशन, कोलकाता, प्रकाशन वर्ष- 2009, प्रथम संस्करण, पृ० 71 6. गुरु राजेश्वर, प्रेमचंद एक अध्ययन, एस चंद एण्ड कंपनी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० 276 7. राम सरिता, उपन्यासकार प्रेमचंद की सामाजिक चिन्ता, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष - 1996, संस्करण - प्रथम, पृ० 105 8. शर्मा रामविलास, प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2014, पृ०150 10. मदान इन्द्रानाथ, प्रेमचंद एक विवेचन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,वर्ष प्रकाशन 1989, पृ० 149 11. सत्येन्द्र (संपादक), प्रेमचंद, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष - 1989, पृ०138 12. वाजपेयी, नंददुलारे, प्रेमचंद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2000 संस्करण प्रथम, पृ० 96 13. शर्मा डॉ० रामविलास, प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-2014,पृ० 253