शारीरिक एवं मानसिक विकास में खेल की भूमिका
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शरीरमाद्य खलु धर्मसाधनम्’ हमारी परम्परा में एक महत्वपूर्ण उक्ति है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष रूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति का साधन शरीर है। अतः शरीर को साधन प्राप्ति योग्य बनाने पर सदैव बल दिया गया है। यही कारण है कि समाधि के मार्ग में आसन व प्राणायाम भी आते है। हमारी ज्ञान परम्परा में शारीरिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित योग व क्रीड़ा का महत्वपूर्ण स्थान है। टोलों, घटिकाओं, आश्रमों, गुरुकुलों में विद्यापीठों में विद्यार्थियों के लिए योग व क्रीड़ा, पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग के रुप में विद्यमान थे, इस बात के प्रचुर ऐतिहासिक प्रमाण प्राप्त होते हैं। कृत्रिम कृषक क्रीड़ा, निलयन क्रीड़ा, कर्मतोत्प्ल्वन क्रीड़ा, गर्तादिलंघन क्रीड़ा, नेत्राबंध क्रीड़ा, स्पन्दान्दोलिका क्रीड़ा, जल क्रीड़ा, कंदुक क्रीड़ा, नियुद्ध क्रीड़ा, घट प्लावन क्रीड़ा, दर्दुरप्लावन क्रीड़ा, गदा क्रीड़ा आदि कुछ प्रमुख खेलों का नाम कई प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार बालक-बालिकाओं के सर्वांगीण विकास (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक आदि) की यात्रा में शारीरिक शिक्षा प्राचीन काल से ही अतीव महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भारतीय ऋषि परम्परा ने तो यह सिद्ध किया है कि वे शास्त्राज्ञ के साथ-साथ बल सम्पन्न भी थे। अतः हमारे विद्यार्जन की प्रणाली में जीवनोपयोगी विद्याओं व शास्त्रों का समुचित समावेश था जिसमें शारीरिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण अंग के रुप में थी। अतः उक्त कहावत हमारी परम्परा में जीवन कौशलों के विकास के लिए शारीरिक शिक्षा अनिवार्य पक्ष है।
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