आज की शिक्षा में स्वायत्तता की समीक्षा
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दुसरो से हस्तक्षेप किये बिना हमारे स्यम के फैसले लेने की शक्ति को स्यायत्तता के रूप मे जाना जाता है। और यदि यह शिक्षा से जड़ी है तो बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर सामने आती हैं। आज शिक्षा के क्षेत्र मे भी कई राजनीतिक प्रभाव व अन्य हस्तक्षेप देखे जा सकते हैं। जो देश के भविष्य पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं। आज जरूरत हैं ऐसे बदलाओ की जो शिक्षा की स्वायत्तता को अराजक होने से भी रोके। यंहा इस लेख में मेरा केंद्र बिंदु जमीनि स्तर पर बदलाओ से है। ना तो मैं यहाँ किन्ही आयोगों की रिपोर्टों के खुलासा करूँगी न ही शिक्षा से जुड़े कोई आंकड़े बताउंगी और ना ही यूजीसी अथवा अन्य किसी संस्थान से जुड़े शोध पर आधारित सन्दर्भ पेश करूँगी। बल्कि यह पूरी तरीके से मेरे अपने निजी अनुभवो अवलोकनों व सुझावों पर आधरित लेख हैं।
आज की शिक्षा पद्धति का रूप बेहद विकृत हो चुका है। शिक्षा सेवा की बजाय व्यवसाय अधिक हो गयी हैं। आज के शिक्षक मासिक तन्ख्वाह पाने वाले चाकर से अधिक कुछ नही है। मैं अपनी बात रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उदाहरण से आरंभ करना चाहूंगी। स्वयं उन्हें भी बचपन मे ही स्कूली शिक्षा पद्धति की रटाऊ पढ़ाई व शिक्षक की पिटाई की वजह से विलगाव हो गया था। जिसने उनके बालमन पर जीवनभर के लिए प्रभाव डाला जो आगे चलकर उनके द्वारा शांतिनिकेतन की स्थापना के लिए नीवं की ईंट बना। वे शिक्षा व्यवस्था व शिक्षा की स्यायत्तता से भलिभांति परिचित थे। शिक्षा में छात्रों व शिक्षको दोनो की स्यायत्तता होना जरूरी हैं। परंतु यहीं स्यायत्तता अगर स्वछंदता व अराजकता बन जाये तो भविष्य का विकृत होना तय है।मैं इस पंक्ति को आज की शिक्षा व्यवस्था मे चरितार्थ होता पाती हूँ कि - बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय। इस व्यवस्था की आड़ मे शिक्षक व छात्र दोनो ही मनमानी कर रहे हैं।
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