श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग
Authors/Creators
Description
कर्मयोग में आए योग शब्द से क्या तात्पर्य है? जिसकी पुनरावृत्ति बारम्बार गीता में की गई है। योग का अर्थ है समत्व की प्राप्ति, ‘समत्वं योग उच्यते।’ सिद्धि और असिद्धि, सफलता और विफलता में सम भाव रखना समत्व कहलाता है। आधुनिक युवा की जुबान जो यह कहती है ‘हार के आगे जीत है।’ यदि योग को अपना ले तो यही बात महज जुबान तक न रह कर उनके अन्तर्मन को भी झकझोरेगी। वर्तमान समय में युवाओं के बीच अवसाद, तनाव, चिन्ता जैसे नकरात्मक शब्द आम बात हो गई है। इसका कारण है भौतिक सुख की उत्कट इच्छा। जिसके पीछे युवा पीढी, समाज को पददलित करते हुए भाग रही है और उनके साथ भाग रही है- तनाव, चिन्ता, विषाद। इस विषाद भरे जीवन से यदि मुक्ति पाना है तो गीता में कहे गए योग का अनुसरण अनिवार्य सा प्रतीत होता है। जो विषाद युक्त युवा पीढी को कर्मयोगी बनाने में सहयोगी होगी। अर्थात समत्व की भावना की जागृति होगी। तभी हार के आगे जीत का हौसला बुलन्द रहेगा और चरेवेति-चरेवेति की भावना के साथ सहस्त्र-सहस्त्र कर्मयोगी का नव निर्माण होगा।
Files
ss-May-2024.pdf
Files
(333.0 kB)
| Name | Size | Download all |
|---|---|---|
|
md5:467ce8f0c0e26bbff8e2e075b8395a3d
|
333.0 kB | Preview Download |