Published February 20, 2024 | Version v2
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नारी चेतनाः अनसुलझी पहेली

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स्त्री अस्मिता के केन्द्र में ‘अस्मिता’ केन्द्रीय धुरी है। जिसमें तथाकथित आधुनिक समाज में हाशिए पर पड़ी स्त्री को बहस के केन्द्र में ला दिया है। पितृसत्ता शताब्दियों से चली आ रही ऐसी व्यवस्था है, जिसमें स्त्रियों को पुरुष के अधीन बताया गया है। वस्तुतः स्त्री का संघर्ष आज से नहीं सम्पूर्ण अतीत से है।

नारी शोषण की समस्या विश्व में कमोबेश एक जैसी है, जिसके कारण विश्व के  अनेक हिस्सों में इस शोषण के विरुदध आन्दोलन चलाए जा रहे हैं। भारत में भी इस आन्दोलन के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

यह शोध-पत्र वर्तमान भारतीय समाज में स्त्रियों की दुर्दशा का एक दस्तावेज प्रस्तु करता है। जिसमें यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि अशिक्षित महिलाओं को यदि छोड़ भी दें तो देखते हैं कि शिक्षित स्त्रियाँ भी समाज, परिवार में कहीं-न-कहीं शोषण की शिकार हैं। समाज में स्त्रियों को हर कदम पर दकियानूसी, रूढीवादी, पितृसत्तामक परम्पराओं के दायरे में रख कर देखा जाता है।

इस शोध-पत्र में विधवा पुनर्विवाह के साथ-साथ स्त्रियों पर हो रहे घरेलु अत्याचार के स्वरूप के परतों को खोलने का प्रयास करता है। मेरी दृष्टि में जागरूक और सबलता पाकर स्त्री किसी भी प्रकार के शोषण से मुक्त हो सकती है। यदि स्त्रियाँ जागरुक होगीं, तो वे शोषण और अन्याय का विरोध अवश्य करेंगी।

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