'फाँस' उपन्यास में उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रभाव
Description
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika"
URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=8193
Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)
Abstract : ‘उपभोक्तावाद’ समकालीन समाज की ऐसी परिघटना है जिससे सभी संवेदनशील और लोकहित के प्रति समर्पित इंसान चिंतित है | उत्पादन और उपभोग मानव सभ्यता के विकास का अनिवार्य अभिलक्षण है | सभ्य मनुष्य ने उपभोग का संस्कार विकसित कर लिया है | वह उन चीजों का उत्पादन करता है जिनकी उसे जरूरत पड़ती है|उपभोक्तावाद एक ऐसी परिघटन है जिसमें जरूरत के लिए नहीं, अपितु मुनाफे के लिए उत्पादन होता है और उत्पादित वस्तु के अनुरूप उपभोक्ता की इच्छाएँ ढाल दी जाती है | संजीव ने ‘फाँस’ उपन्यास में दर्शाया है कि उदारीकरण के चलते सरकार का रवैया ही कारपोरेट वाला हो चुका है- बिल्कुल ठुस्स यांत्रिक | कारपोरेट कल्चर या बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जाहिर तौर पर किसी बड़ी पूँजी की प्रसूत होती है, जिस वजह से किसानों को बाजार से संघर्ष करना पड़ता है | किसानों का बाजार से होने वाला यह जबरदस्त संघर्ष को ही ‘संजीव’ ने अपने ‘फाँस’ उपन्यास में अभिव्यक्त किया है |
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Identifiers
- ISSN
- 2349-980X
Related works
- Is published in
- Journal article: 2349-980X (ISSN)
Dates
- Submitted
-
2024-01-11
- Accepted
-
2024-01-21
References
- 1. संजीव, फाँस,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2018 ई., पृष्ठ सं-201 2. अमरनाथ, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2012 ई. पृष्ठ सं- 93 3. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2018 ई., पृष्ठ सं-111 4. वही पृष्ठ सं- 141 5. वही पृष्ठ सं- 190 6. सिंह, योगेन्द्र, गर्भनाल पत्रिका (प्रवासी भारतीयों की मासिक ई- पत्रिका) संपादक- सुषमा शर्मा, भोपाल(म.प्र.) 462023 संस्करण- अगस्त 2022