२१ वीं सदी के हिंदी काव्य में चित्रित हाशिए का समाज
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- 1. हिंदी विभाग, जयसिंगपुर कॉलेज, जयसिंगपुर तहसील: शिरोळ जिला: कोल्हापुर ४१६१०१ महाराष्ट्र, भारत
Description
२१ वीं सदीं में भारत को सार्वभौमिक राष्ट्र बनाने के लिए हमें गरीबीं, भूख, युद्ध, सामाजिक - आर्थिक विषमता के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। प्राचीन काल से वर्तमान काल की कविताओं में समाज द्वारा प्रताड़ित, पूंजीपतियों द्वारा शोषित तथा भूमंडलीकरण से प्रभावित एक ऐसा जनसमुदाय जिसे हाशिए का समाज कहा जाता है, मूल केंदीय विषय बना है। दलित समाज और हाशिए में मुलभुत अंतर केवल इतना है कि, कृषि - कर्मियों और नौकरों के साथ अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं किया जाता।'' संस्कृत, मराठी, हिंदी, अंग्रेजी भाषा कोई भी हो, उस भाषा में लिखी गई कविताएँ उस समाज की आत्मपीड़ा, शोषण, वेदना को अभिव्यक्त करती है। काव्यरचनाओं में उन्होंने समाज के वंचित तथा मुख्य धारा से अलग, शोषित उत्पीडित घटक की और सबका ध्यान आकर्षित किया। हिंदी साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुसार "वर्ण - व्यवस्था से उपजी घोर अमानवीयता, स्वतंत्रता - समता विरोधी, सामाजिक अलगाव की पक्षधर सोच परिवर्तित कर बदलाव की प्रक्रिया को तेज करना ही मूल संवेदना है।" काव्य के माध्यम से समाज जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने वाले कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि। इनकी कविताओं में दलित वर्ग की समस्याओं को अभिव्यक्त किया है। उनकी कविता भले ही दलितों के समस्याओं को उजागर करनेवाली कविताएँ कही जाती हो। पर उनकी कविताएँ हाशिए का समाज समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है। हाशिए समाज की संकल्पना को विस्तार से समझकर उनके प्रति सहानुभूति और सवेदनशीलता को बढ़ाना होगा। जब उन्हें सामाजिक, आर्थिक शैक्षिक विकास के अवसर उपलब्ध होंगे, समाज सवेंदनशीलता से व्यवहार करके उन्हें नौकरी व्यवसाय और सामाजिक जीवन में समान अधिकार देगा। सन्मानपूर्ण का जीवन जीने के अवसर प्रदान करेगा। तभी २१ वीं सदीं आत्मनिर्भर कुशल मनुष्यबल वाला तथा बलशाली देश बन पायेगा।
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