वर्तमान भारत में शिक्षा का पुनरूत्थानः एक अध्ययन
Description
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Innovation The Research Concept"
URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=7433
Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)
Abstract :एक समय था जब दुनिया में,
विष्व गुरू हम कहलाते।
ज्ञान पिपासु भारत भू पर,
ज्ञानार्जन को आते।
समृद्ध था साहित्य हमारा,
विज्ञान कला में माहिर थे।
भारत की शिक्षा के चर्चे,
सारे जग में जाहिर थे।
जड़ से जुड़ी हुई शिक्षा थी,
संस्कार की पोषक थी।
उन बातों का था विरोध,
जो मानवता की शोषक थी।
लेकिन धीरे - धीरे हमने,
अपने आपको भूला दिया।
'मैकाले' की मीठी गोली ने,
हमें नींद में सुला दिया।
शिक्षा में पश्चिम के मानक को,
हमने स्वीकार किया।
अपनों से हम दूर गये,
और गैरों को ही प्यार दिया।
इस कारण शिक्षा का स्तर,
नीचे गिरता चला गया।
पश्चिमी सोचों के हाथों में,
देश हमारा छला गया।
आओ सोचें कैसे फिर से,
शिक्षा का 'उत्थान' करें।
जड़ से जुड़े हुए रहकर,
नित नूतनता का आह्वान करें।
विश्वगुरू भारत की 'शिक्षा' का परचम सम्पूर्ण विश्व में फहराता था। यहाँ की गुरूकुल शिक्षा प्रणाली ने दुनिया को कई विद्वान मनीषी, कलाकार, योद्धा साहित्यकार और वैज्ञानिक प्रदान किए है। कालान्तर में शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव और भारतीयता से भटकाव ने शिक्षा की गुणवत्ता को कम किया है।
आधुनिक भारत में शिक्षा के पुनरूत्थान हेतु इसके विभिन्न आयामों में भारतीयतानुरूप परिवर्तन अपेक्षित है। पाठ्यक्रम, अध्यापन शैक्षिक प्रबन्धन, प्रशासन और मूल्यांकन शिक्षा के इन सभी पक्षों में बदलाव आवश्यक है। पाठ्यक्रम में जहाँ भारतीय मूल्यपरक विषयवस्तुओं का समावेष किया जाना चाहिए वहीं अध्यापन प्रभावशाली बन सके ऐसे प्रयास जरूरी है। इस हेतु नवीनतम तकनीकों के उपयोग के साथ शिक्षण को केवल औपचारिक नहीं बनाकर प्रायोगिक तथा व्यावहारिक बनाया जाना आवश्यक है। शैक्षिक प्रशासन और प्रबन्धन शिक्षाविदों के हाथों में होने से भी आधुनिक भारत में शिक्षा को सुदृढ़ता प्रदान की जा सकती है। विद्यार्थियों का समग्र एवं सतत् मूल्यांकन, निष्पक्ष मूल्यांकन तथा विषयानुरूप मूल्यांकन भी शिक्षा को मजबुती प्रदान कर सकता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आधुनिक भारत की शिक्षा हमारी जड़ों से जुड़ी हुई हो और आधुनिकता का समावेष भी उसमें होना आवश्यक है।
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- ISSN
- 2456-5474
Related works
- Is published in
- Journal article: 2456-5474 (ISSN)
Dates
- Submitted
-
2023-09-11
- Accepted
-
2023-09-19
References
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