कमृदुला गर्ग की कहानियों में नारी
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प्राचीन काल की औरत से आधुनिक काल की औरत बेहतर है। पहले जिस समाज को पुरुष प्रधान समाज नाम से पहचाना जाता था, आज उस विचार में बहुत-कुछ बदलाव आया है। स्त्री घर के बाहर जाकर नौकरी-पेशा, काम-काज करने लगी है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र बन रही है। हमेशा पति के सामने हाथ बढ़ानेवाली स्त्री, दिमागी तौर पर पुरुष को ही कमजोर समझने लगी है। नया मजदूर वर्ग, बेकार शिक्षित युवा, आदि की अभूतपूर्व वृद्धि के कारण आर्थिक ढांचा एकदम बदल गया है। साहित्य में वर्तमान भारतीय समाज की आर्थिक परिस्थितियों से जन्म लेनेवाली स्त्री साठोत्तरी कहानियों में अर्थतंत्र का प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव उसका बहुत ही स्पष्ट है। नारी की आर्थिक स्वतंत्रता उसके जीवन में आनेवाले परिवर्तन की शुरूआत है। घर-बाहर की लेन-देन जैसी व्यवहार भी करने में नारी कितनी सक्षम है, उसका खास चित्रण साठोत्तरी लेखिकाएँ अपनी कहानियों के माध्यम से दर्शायी हैं। स्त्री की दशा-दिशा को लेकर श्रीमती मृदुला गर्ग ने अपनी कई कहानियों में आवाज उठायी है।
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मृदुला गर्ग की कहानियों में नारी2.pdf
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