र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा
Description
आ ैर मन का घनिश्ठ सम्बन्ध ह ै, ये तो हम सभी जानते ह ै। स्वस्थ मन स्वथ्य षरीर शरीर आ ैर स्वस्थ्य षरीर ही निर्वि कार मन
का वरण करता ह ै। रंग, मन आ ैर आत्मा की आ ैशधि है और इसीलिये वह विभिन्न षारीरिक मानसिक रोगा ें का प ्रतिरोध करने
की क्षमता रखती है। मनुष्य के जीवन में रंगा ें का महत्वपूर्ण स्थान ह ै। वर्ण पूर्ण तः प्रकाष व दृश्टि पर निर्भर तत्व ह ै। एक की
भी अनुपस्थिति रंग क े ज्ञान में बाधक सिद्ध हा ेती है। प ्रत्येक वस्तु का कोई न कोई रंग अवष्य होता ह ै आ ैर मूलतः वस्तुओं की
पहचान उनके धरातलीय रंग क े कारण ही होती ह ै तथा प्रकाष की मात्रा क े कम या अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तु
अलग-अलग दिखलायी पडती ह ै।
प ्रकाष किरणे पदार्थ पर पडकर, समाहित होने क े पष्चात् पुनः परावर्तित होकर प ्रकाष का े वापस कर देती ह ै जा े प ्रकाष पदार्थ
से वापस आता है उस में उसका वर्ण तथा अन्य गुण होते ह ै जा े दर्ष क के अक्षपटल पर पडते ह ै और वस्तुएँ रगींन दिखाई
देती ह ै । अक्ष पटल के पास ही षलकायें व षंकु नाम की सूक्ष्म तन्तु ग्रन्थियाँ हा ेती ह ै, जिनके द्वारा हम वस्तु से परावर्तित
प ्रकाष तरंगा ें से वस्तु क े वर्ण का ज्ञान करते ह ै।इस प्रकार हम कह सकते ह ै कि वर्ण प ्रकाष का गुण ह ै, कोई स्थ ूल वस्तु नहीं
ह ै। इसका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं ह ै, बल्कि अक्षपटल द्वारा मस्तिश्क पर पडने वाला एक प्रभाव है। वर्ण वस्तु का गुण नहीं
ह ै इसका मूल कारण सूर्य का सतरंगी प ्रकाष ह ै। रंग, प ्रकाष तथा वस्तु की स्थिति, दर्षक की ‘ग्राहय’ स्थिति पर निर्भर करता
ह ै। रंगा ें का अध्ययन भौतिक विज्ञान तथा मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। इसके साथ ही एक कलाकार क े लिए रंग
का रसायन षास्त्र जिसमें रंग-निर्माण में प ्रयोग मे ं आने वाले स्थ ूल वर्ण -द्रव्य का ज्ञान तथा मानव मस्तिश्क पर रंगा ें द्वारा पडने
वाले मना ेवैज्ञानिक प्रभावों व मानसिक स्थितियों की जानकारी भी नितान्त आवष्यक ह ै।