भारतीय फिल्म संगीत म ें रसानुक ूल रंग-स ंयोजन
Authors/Creators
- 1. प ्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, क ंठ स ंगीत विभाग, म.ल.ब. शा. स्ना. कन्या महा. किला भवन, इन्दौर
Description
मानव-सभ्यता क े साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ। चा ैसठ कलाओं में संगीत-कला, चित्र-कला आ ैर काव्य-कला विषेष
महत्व रखती हैं। इनमें भी संगीत-कला अधिक प ्रभाव डालने वाली कला है। मनुष्य के हृदय में सुप्त भावा ें को जागृत करने में
संगीत जितना सक्षम ह ै, उतनी आ ैर कोई विद्या नहीं। जो भाव चित्र क े माध्यम से व्यक्त नहीं किये जा सकते, उन्ह ें काव्य या
भाषा क े माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता ह ैं आ ैर जिन भावों का े व्यक्त करने में भाषा भी असमर्थ रहती ह ै, उन्ह ें संगीत
सहज ही व्यक्त कर देता ह ै।।शाॅप ेन हाॅवर का कहना है - ’’क ेवल संगीत ही ऐसी कला है, जो श्रोताआ ें से सीधा संबंध रखती
ह ै। इसे किसी भी माध्यम की आवष्यकता नही ं हा ेती।’’
कलाकार क े अंतरंग स े छेड़ा ह ुआ सुर श्रोता क े अंतस् को छूकर उसे दिव्य ला ेक में प ्रतिष्ठित कर देता ह ै।
जिस प ्रकार मूल रंग सात हा ेते ह ैं अथवा मूल रसना-रस छः हा ेते ह ै ं, परंतु नेत्र आ ैर जिव्हा केवल उनसे तृप्त नहीं होते अपितु
उनक े असंख्य भ ेदा ें की आ ैर उनमें तालमेल कर नयी रसनिष्पत्ति की भी इच्छा रखते ह ैं, ठीक उसी प ्रकार मनुष्य क े कान भी
क ेवल मूल सात स्वरा ें की ध्वनिया ं सुनकर पूर्ण तृप्त नहीं होते, अपितु नित्य नूतन स्वर-सन्दर्भों क े उद्भव से ही संतुष्ट होत े
ह ैं। हर्ष, शोक इत्यादि चित्तव ृत्तिया ें का जब नाद के स्पन्दन में स्थित श्र ुतिया ें से तादात्म्य होता ह ै तो मनुष्य की चेतना स्थिर
होती ह ै आ ैर उस स्थिर अवस्था में ही सौन्दर्य बोध होता ह ै। यही तद्गत शब्द सार्थ क हा ेता है।