Published September 11, 2017 | Version v1

वर्ण-सौन्दर्य द्वारा दर्शक स े संवाद करती भारतीय कला

  • 1. विभागाध्यक्ष-ड्राइंग एव ं पेण्टिंग विभाग, रघ ुनाथ गल्र्स (पीजी) काॅलिज, मेरठ (यू0पी0)

Description

कला और सौन्दर्य-ये दा े शब्द कला जगत में एक ज ैसे होते हुए भी बह ुत विस्तृत ह ैं। स्थूल तैार पर हम कला आ ैर सा ैन्दर्य में
का ेई अन्तर नहीं कर पाते। सा ैन्दर्य एक मानसिक अवस्था ह ै आ ैर वह देश-काल से मर्या दित है। इस सा ैन्दर्य रूपी व ृक्ष की दो
शाखायें ह ैं-एक प्रकृति तथा दूसरी कला। कलागत सौन्दर्य पर दा े दृष्टियों से विचार किया जा सकता है। पहली दृष्टि यह है
जिसमें हम कलाकार को क ेन्द्र में रखकर विचार करते ह ै ं अर्थात् कलाकार की कल्पना में किस प ्रकार कोई कलाकृति आकार
ग्रहण करती ह ै आ ैर वह किस रूप में दर्श कों क े सम्मुख प्रकट हा ेती ह ै। दूसरी दृष्टि में दर्श क का े क ेन्द्र में रखा जाता है, अर्थात्
कलाकृति को निरख दर्शक क े मन में क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है और उसके व्यक्तित्व अथवा सामाजिक जीवन में किस
प ्रकार कितनी मात्रा में परिवर्तन करती ह ै। किसी भी कृति के रसास्वादन में वर्ण का विशेष महत्व है। वस्तुतः वर्ण  स्पेस में
प ्रकाश की श ृंखला है, अर्था त् प्रकाश का गुण ह ै।1 वर्णों द्वारा ही मानव-जीवन लय तथा रसमय होता ह ै। वर्णों का सुन्दर या ेजन
ही कृति को मना ेरम रूप प्रदान करता है। भारतीय कला के छः अ ंगा ें में वर्ण भी कला क े महत्वप ूर्ण  अंग क े रूप में वर्णि त है।
‘शिल्परत्न’, ‘कादम्बरी’, ‘नाट्यशास्त्र’ तथा ‘विष्णुधर्मोत्तर प ुराण’ आदि प्राचीन ग्रन्थों में वर्णों क े प ्रकार एवं महत्व का सविस्तार
वर्ण न ह ै। वर्ण का स्रोत सूर्य ह ै। जिस प्रकार सूर्य सभी ऊर्जाओं का स्रोत ह ै उसी प्रकार वर्ण भी उसक े प्रकाश से ही उत्पन्न
होते ह ै ं।2 माघ मास में या वर्षा  ऋतु में आकाश में जो इन्द्रधनुष दिखाई देता है, उसमें सात वर्ण  होते ह ै ं जा े वर्ण दर्शक को
सूर्य क े प्रकाश के कारण ही दिखाई देते ह ै ं।3 अतः वर्ण का उत्पत्ति-स्रोत सूर्य का प ्रकाश ही ह ै। हमें भी अपने दैनिक जीवन में
विभिन्न रंगा ें की जो आभा दिर्खाइ  देती है, उसका अस्तित्व प ्रकाश द्वारा ही संभव ह ै। एक ब ंद अ ंध ेरे कमरे में रंगा ें का कोई
अस्तित्व नहीं होता, क्या ेंकि अंध ेरा अंधा हा ेता है।

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